Saturday, October 13, 2012


  बनवारी नै कुण मार् यो 




जिनगी अर मौत बिचाळै एक  पड़दौ हुवै। झीणौ-सोक । जको  नीं सरकै  इत्तै भींत जिस्यौ काम करै अर सरक्यां? दिन...महीना अर बरसां रौ फासलौ पल-छिन मांय सांवटीजै।
म्हैं बनवारी री बात करूं..........बनवारी स्याग री। स्यात थे उण नै जाणौ कोनी। पंचोटियौ मिनख है। साढी छै फुट रौ डील। तड़ींग-सौ। सफाचट मूंडौ अर कलफ गेरेड़ौ चोळौ-पजामौ। ऊमर पैंताळीस रै लगैटगै। गामै कठैई रोळौ-बेदौ हुवै तौ भाजनै बनवारी नै बुलाइजै। किण ई गरीब-गुरबै री छोरी रौ ब्याव नीं हुंवतौ लागै तौ बनवारी रौ बटुऔ त्यार। थाणेदार-बीडीऔ आवै तौ बनवारीआळै घरां। गाम तौ गाम, गुवांड मांय ई चौगड़दै बनवारी ई बनवारी हौ। एक  गेड़ै सरपंच ई रैय लियौ, पण कोई मोद नीं। वा ई आ-बैठ, वा ई मनवार। बिंयां’स राम री मेर ही। सत्तर बीघा जमीन। खूडोखूड भीजै। मांय बीजळीआळौ ट्यूबैल न्यारौ। दाणा कांकरा  ज्यूं भेळा करै। दौ ई भाई। आगड़ा ठाठ हा।
बूढिय़ौ तिसळ्यौ तौ दोनूं भाई न्यारा हुयग्या। बिंयां बूढियै रै जींवतां थकां ई दौ आंगणवाई बणा ली ही बनवारी। दोनू आंगणां बिचाळै कड़-सूदी भींत। लुगाई-पता कड़ पाधरी करै तौ कीं ओट रैय जावै। न्यारा हुया तौ पुराणियौ आंगणौ छोटियै भाई श्योंदै रै अर नुंवोड़ौ बनवारी रै पांती आयौ। हां... बिचाळै री भींत अबार ई बिंयां ई ही।
बनवारी म्हारौ लंगोटियौ हौ। घूतौ-गिंडी अर कुरां री बातां जाणै काल री-सी लागै। बांकळी कींकर रै थोथै पेडै सूं तोतै रा बचिया काढतां थकां गिट्योड़ी आखी दुपारी हाल ई आंख्यां मांय तपै। कींकर री सूळां सूं पिंडी  अर साथळ बींधिज जांवती पण वां दिना रौ बी एक नसौ हुवै। गोडा-अकुणी छुलै तौ छुलौ भलां ईं। छेक·ड़ खरखोदरै मांय हाथ घाल बचिया काढ ई लेंवता। केई ताळ तांईं कींकर हेठै बैठ्या रैंवता। बचियां साथै रमता। वां रै कवळै-कवळै डील नै परसता। दिन कद मांयकर ढळ जांवतौ, ठाह ई कोनी लागतौ। दोनुवां री निजरां मिलती अर घरां चालण री मून बात  हुंवती। बनवारी कींकर रै पेडै ओजूं चढतौ। सर·नै खरखोदरै तांईं पूगतौ अर म्हारै कानी लाम्बौ हाथ पसारतौ, ‘ल्या पूठा छोड देवूं।’ म्हैं उण री आंख्यां मांय झांकतौ। साफ अर झीणी आंख्यां। ठाह नीं कांई  हौ उण री आंख्यां मांय। आज ई जद कदेई वां दिनां री ओळ्यूं आवै, ‘क्यां खातर गोडा छुलांवता हा.........’ तौ हांसी री जिग्यां आंख्यां मांय पाणी झबळक आवै।
साची......भीतर सूं ब्होत नरम हौ बनवारी। न्यारा हुया उण दिन तौ रोवण ई ढुकग्यौ। सिंझ्या मोड़ै-सीक म्हैं गयौ हौ। वौ बारलै ·मरै मांय एकलौ ई बैठ्यौ हौ। घूंड घाल्यां। ठाह तौ म्हनै हौ ई। मजाक करी...‘न्यांगळ-न्यूंगळ ?’ 
उण म्हारै कानी देख्यौ। पाणी सूं हळाबोळ आंख्यां। औ कांईं ? म्हारौ भीतर धूजग्यौ। उतावळी-सी कनै बैठ्यौ। वौ खिंडग्यौ...‘हू ऽ..हू ..ऽऽ।’
‘बावळौ हुयग्यौ रैय.....। लोगां रा फैसला न्यारा करावै। डील रौ धणी, यार। इंयां रोया करै? न्यारा ई तौ हुया हौ, कांईं दूर हुयग्या? न्यारी तौ दुनिया हुवै। न्यारा ई नीं हुंवता, तौ गाम बारकर बाड़ हुंवती नीं?’ 
म्हैं घणी ई ताळ तांईं सबदां री कारी लगांवतौ रैयौ, पण, भीतर पाट्योड़ै रै कारी कद लागै?
बखत भाजतौ रैयौ। कठैई खोज मंड्या, कठैई कोनी। 
च्यार साल हुयग्या न्यारा हुयां नै। आंगणै बिचाळै री भींत अबार ई बिंयां ई ही....·ड़्यां-·ड़्यां। छोटियै भाई स्योंदै रै छोरै राजियै अर बनवारी री छोरी कमलेस रौ ब्याव हौ। जाणै एक  ई आंगणौ हुवै। टाबर.......? टाबर तौ बिंयां ई सोरपाई चावै। टाबर कद भींत चावै?
ब्याव पछै स्योंदै रै आंगणै बीनणी आयी तौ दुराजै मांय बड़तां ईं बनवारी रा पग एकर झिझको  खांवता। वौ खंखारौ करनै आंगणै मांय आंवतौ। टाबरां सूं ऊंची आवाज मांय बतळांवतौ....जाणनै। भींत सूं परै बीनणी बुहारी काढती, पाणी भरती। ऊंची आवाज बीनणी अर बनवारी बिचाळै पड़दौ हुय जांवती।
बिंयां बीनणी आयां पछै बनवारी आंगणै मांय कमती ई रैंवतौ। रोटी जीमी अर पार....। एक बंधण-सौ हुयग्यौ जाणै, पण फेर ई भींत नै ऊंची करण री बात सूं जीभ ताळवै चिप जांवती।
सिंझ्या रौ बखत हौ। भींत सारै उठावड़ै चूल्है माथै रोटी बणै ही। बनवारी बारै सूं आयौ। खंखारौ ·र्यौ अर माची माथै आयनै बैठग्यौ।
‘रोटी घाल द्यो  भई।’
टाबर जीमै हा। इण आंगणै ई अर उण आंगणै ई। बीनणी भींत सारै धरेड़ी माट मांय पाणी भरै ही। पल्लौ सरकग्यौ। बिच्यारी बीनणी। सरमां मरगी। उतावळी-सी हाथ सूं पाणी री बाल्टी फैंकी  अर हाथ सूं पल्लौ साम्यौ। जीमतां-जीमतां बनवारी री निजर एकर  चकिजी अर ओजूं थाळी मांय टिकगी। देखै सगळा ई हा पण कोई कोनी बोल्यौ। राजियौ आंगणै मांय ई ऊभौ हौ। अचाणचक ई पाटग्यौ, ‘इंयां......ऊंट-सौ मूंडौ चक्यां राखौ.......बहू-बेटी री कीं  सरम है’· कोनी?’
हाथ रौ कोर हाथ मांय ई रैयग्यौ। निजर थाळी मांय ई चिपनै रैयगी जाणै। पळ·तौ सफाचट मूंडौ, स्याह हुयग्यो । होठ एकर धूज्या पण आवाज कोनी नीसरी। भीतर ई मुडग़ी। कानां सुण्या बोल काळजै जमग्या।
सिंझ्या म्हैं पूग्यौ जद बारलै कमरै मांय बैठ्यौ हौ। घूंड घाल्यां।
‘बनवारी ·कांईं बात?’
पण मूंडै बोल कोनी। एकर  म्हारै कानी देख्यौ। आंख्यां मांय पाणी तिर आयौ अर निजरां हेठै झुकगी। स्योंदौ कठैई गमीतरै गयोड़ौ हौ। आंवतां ई राजियै नै रोळा कर्या । भाई सूं माफी मांगी। राजियै नै पगां लगायौ, पण बनवारी....? पाथरीजग्यौ जाणै। एक कानी देखतौ रैवै। टुकर-टकर। एक· ई ठौड़ माथै निजर टिकायां राखै। आंख्यां पाटण नै हुंवती तौ निजर सरकनै किण ई दूजी ठौड़ माथै जा टिकती।
हनुमानगढ़-बीकानेर, छेकड़ जैपुर तांईं जा पूग्या। डागदर माथै डागदर। दुवाई माथै दुवाई। आठूं पौर चूंच राखता, पण होठ कोनी हाल्या। भूख लागती, जीम लेंवतौ। नींद आंवती, सोय जांवतौ। पड़्यां-पड़्यां डील रौ वजन बधै हौ.....स्यात भीतर रौ ई।
इकांतरै-दूसरै री जिग्यां म्हैं इब रोज ई जावण लाग्यौ। म्हनै आयौ देख बनवारी एकर म्हारै कानी देखतौ पछै वा ई बात। गामगा चालनै आंवता। निसकारौ मार सरक जांवता। कुण ·कांईं करै?  एक  दिन, मोड़ौ ई हुयर्यो  हौ। म्हैं कमरै मांय बड़्यौ, तौ उण म्हारै कानी देख्यौ। देखतौ रैयौ....देखतौ रैयौ। निजर म्हारी निजर मांय टांग दी। म्हैं उण री आंख्यां मांय देख्यौ। डूंगी .... अर और डूंगी आंख्यां। डूंगै तांईं पाणी ई पाणी। अचाणचक ई पाणी री कोई लैर चकिजी अर देखतां ई देखतां टप्पां चढगी।
‘म्हैं इस्यौ तौ कोनी, यार.....।’
लैर किनारै आयनै ढुळगी। सुण्यौ तौ म्हारै पांख लागगी। म्हीना पछै म्हारौ यार म्हारै साम्ही हौ। म्हारौ हाथ उण रै मगरां माथै हौ इब.. अर वौ ‘टप...टप’ पंघळै हौ।
उण दिन म्हैं ब्होत राजी हौ। घरां आयौ तद तांईं रात ढळगी ही, पण म्हारै मन मांय उमाव हौ...‘ बनवारी इब ठीक हुय जासी।’
म्हारौ औ उमाव घणा दिन कोनी रैयौ। बनवारी अबार ई बिंयां ई हौ। अलबत कदे-कदास होठ हालता...‘म्हैं इस्यौ तौ कोनी ...यार...?’ इण सूं बेसी कीं नीं बोलतौ। हां, म्हारै सारु एक काम लाधग्यौ। रोज बनवारी कनै बैठक करणी अर उण नै बिलमावण री कोसिस करणी। भीतर किण ई कूणै मांय एक · भरोसौ हाल ई कायम हौ...‘स्यात बात बण सकै ।’
‘म्हैं इस्यौ तौ कोनी ....यार,’ का फेर  ‘आ ·कांईं हुयी बटी...’ सूं आगै कोनी बध्यौ बनवारी। 
म्हारौ भरोसौ डिगौ खावण लाग्यौ। छेकड़ म्हैं उण नै मजाक मांय लेवण लाग्यौ।
‘नां कुण कैवै थूं इस्यौ है।’
वौ कान मांड्यां राखतौ, जाणै म्हारी बात नै गोखतौ हुवै।
काल सिंझ्या री बात है। वौ होठां ईं होठां मांय कीं  बरड़ावै हौ। म्हैं आयौ तौ   म्हारै कांनी देख्यौ। कुरतै री ·कालर हटायी अर नाड़ म्हारै साम्ही कर दी। देख्यौ लील जमरी ही।
‘कांईं हुयौ ?’ म्हनै चिंत्या हुयी।
‘फांसी लगावै हौ...पण, जेवड़ी मुरदी ही बटी। टूटगी।’
म्हारी समझ मांय कोनी आयौ कै कांईं कैवूं। खेत मांय पाणी री बारी ही। फगत राजियै नै कैवण सारु आयौ हौ कै  गाडौ लेयनै आवै तौ म्हारलै घर कानीकर आ जायी।
केई ताळ चुप रैयनै म्हैं बनवारी कानी देख्यौ। दया-सी आयी। पछै हांसियां मांय ले लियौ।
‘यार,  कुंटल पक्कौ डील है...इसी जेवड़ी सूं कांईं हुवै हौ। दौ बोरांआळौ जेवड़ौ ले लेंवतौ ?’
उण म्हारी आंख्यां मांय देख्यौ। ठाह नीं कांईं हौ उण री आंख्यां मांय। म्हनै खुद रै सबदां माथै सरम आयी। पछै केई ताळ तांईं म्हैं उण नै समझांवतौ रैयौ। ओजूं राजियै नै हेलौ पाड़्यौ अर घरां आयग्यौ।
पाणी री बारी हाल खतम कोनी हुयी ही। बड़ै झांझकै  ई राजियै सूं छोटियौ खेत मांय पूग लियौ। ऊपरसांसां।
‘ता..ऊ...फांसी खा...ली।’ 
कैय वौ रोवण ढुकग्यौ। म्हारै हाथ सूं कस्सी छुटगी। स्योंदौ...राजियौ, सैंग रोवै हा। म्हैं भींत बण्यां ऊभौ हौ।
अबार, स्योंदै गाडौ जोड़्यौ है। म्हे सगळा गाडै माथै हां। पांवडै-पांवडै गाम नेडै़ आंवतौ जावै। गामै बड़तां ईं घर आसी। बनवारी रौ घर..अर घरां? म्हैं स्योंदै कानी देखूं। स्योंदौ चुप है। राजियौ... अर म्हैं ई चुप हूं। बता कोनी सकूँ  रातआळी बात। ...पण, भीतर कोई है, जको    बांग मारै...‘बनवारी नै कुण मार्यो ..ऽऽ?’
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बाग चिड़िया और स्वप्न
- पूर्ण शर्मा ‘पूरण’

वह सिर्फ छः साल की थी या शायद इससे भी कम। स्कूल से लौटने के बाद उसका अधिकतर समय होमवर्क करने या बाहर गली में सोनू, टिंकू और दूसरे साथियों के साथ खेलने में बीतता। मां के पास वह बहुत कम ही रह पाती अलबत्ता पड़ौस की सुनीता दीदी से वह इतना अधिक प्यार करती कि उन्हीं की साईकिल के पीछे बैठकर स्कूल आते-ज
ाते भी उसका मन न भरता। सांझ ढलते ही फिर से उनके पास चली आती, ‘दीदी, कहानी सुनाओ ना....’। दीदी उसे ढेर-सी कहानियां सुनाती। फूलों-जंगलों की कहानी, नदी-पहाड़ों की कहानी, नन्हे खरगोश-गिलहरी की कहानी या प्यारी-प्यारी परियों की कहानी। पर रोज ऐसा होता कि वह सुनीता दीदी से कोई कहानी सुन रही होती और चुपके से नींद आकर उसे सुला देती। पर...कहानी फिर भी चलती रहती। हां... सपने में। दीदी धीरे-से उसे उठाकर अपने कंधे से लगाती और उसके घर पर लाकर सुला देती। पर वह अब भी दीदी के साथ होती।
सुबह अपने कमरे के बेड पर खुद को देखकर उसे कभी समझ में नहीं आया कि ऐसा क्यों होता था..... वह रोज तो दीदी के साथ उनके घर पर सोती पर सुबह उठते समय अपने स्वंय के घर में होती।
अक्सर वह अपने सपनों और हकीकत में फर्क नहीं कर पाती थी। कभी-कभी जो हो रहा होता वह सपना होता या जो सपने में देख रही होती, हकीकत होती।
पिछले महीने ही जब उसने अपने स्कूल के एक कार्यक्रम में अपनी प्यारी-सी आवाज में गाना सुनाया तो ढेरों तालियां बजी थीं। कार्यक्रम के समापन पर उसे एक गिफ्ट हैंपर भी दिया गया था। उसे सब कुछ सपना-सा लगा और वह खुशी से उछल पड़ी। .....अचानक उसे खयाल आया कहीं वास्तव में स्वप्न ही तो नहीं ? अपनी जांघ पर बाकायदा चिकौटी काटकर ही उसे तसल्ली हुई थी।
सपने उसे हर रात आते। खाना खाने के तुरन्त बाद वह दीदी के घर दौड़ पड़ती और दीदी से लिपट जाती......‘कहानी सुनाओ ना...’। हालांकि वह कोई भी कहानी पूरी न सुन पाती। कहानी खत्म होने से पहले ही गुलाबी नींद का कोई झौंका आता और वह बह जाती। रात भर एक-एक कर सपनों के कंधे बदलते रहते और वह यहां से वहां, वहां से यहां घूमती रहती। कभी-कभी तो वह बहुत दूर निकल जाती...... एक अनजानी जगह। ऊंचे-ऊंचे मकानों, रेत के धोरों और नदी की धार पर से गुजरते हुए जंगल और पहाड़ों से भी ऊपर वह बादलों तक जा पहुंचती। रूई की गेंदों जैसे बादल ! वह उन्हें अपनी बांहों में भर लेना चाहती। सफेद, हल्के गुलाबी या कुछ-कुछ स्लेटी रंग लिए हुए खरगोश की तरह भागते बादलों के मध्य वह खुद एक बादल हो जाती....नन्हा-सा बादल। खुशी से वह नाचने लगती तो गुलाबी रंग की उसकी फ्रॉक का घेर फैलकर सब कुछ ढक लेता और उसके चारों और हल्की लालिमा बिखर जाती। बादल गायब हो जाते। वह फिर से बादलों के पास जाना चाहती पर कमरे की खिड़की से सूरज की पहली किरण चुपके-से भीतर आ जाती और मां उसे झिंझोड़ कर जगा देती। वह आंखें फाड़-फाड़कर मां की तरफ देखती। नजरें गड़ाकर बिखर गए सपनों को फिर से संजोने का प्रयास करती।
‘क्या देख रही है यूं..... उठना नहीं ?’ मां उसके गालों को प्यार से सहलाती। तब तक उसका निचुड़-सा गया चेहरा फिर से सामान्य होने लगता। कमरे में आती धूप का एक टुकड़ा अचानक उसके गालों पर चमकने लगता..... जैसे रात भर के सपनों का अहसास दिप-दिप करने लगा हो।
सपने उसे पहले भी आते थे जब वह इससे भी छोटी थी। शायद चार साल की या इससे भी कुछ कम। पर तब उसके सपनों और हकीकत में अधिक अन्तर न था। सपने में रात भर मां के साथ उड़ रही होती तो दिन में मां की ही अंगुली थामे या उसके आगे-पीछे घूमती रहती। स्कूल जाने लगी तो उसके सपनों में मां के साथ कुछ और लोग भी जुड़ने लगे। पर वे सब वही लोग थे जो उसके इर्द-गिर्द होते, जैसे टिंकू... मोनू..... निशा .... भोलू और सुनीता दीदी।
सुनीता दीदी उसे बहुत अच्छी लगती। लंबे काले बालों से घिरा उनका गोल चेहरा चांद-सा दमकता। वे जब उसे कहानी सुनातीं तो वह उनकी पनीली आंखों में खो जाती।
सुबह उन्हें जब कॉलेज जाना होता तो अपनी साईकिल को दरवाजे के ठीक सामने लाकर ट्रिंग....ट्रिंग घंटी बजाती। वह अपना बस्ता उठाये तैयार होती और भागकर साईकिल के पीछे जा बैठती। चमकते लाल रंग वाली साईकिल के पीछे बैठकर सवारी करने में उसे बड़ा मजा आता। खुली सड़क पर आते ही दीदी जब साईकिल को लहराकर चलाती तो वह खुशी से झूम उठती। कुछ ही देर में जैसे उड़ने लगती.....
मुख्य सड़क से उतर कर साईकिल जब उसके स्कूल की तरफ जाने वाली कच्ची सड़क पर मुड़ती तो ऊंचाई पर चढ़ते हुए जरा धीमे हो जाती। ऊंचाई पर कुछ लहराकर चलने से साईकिल उसे रेंगती हुई-सी लगती। धीरेे-धीरे ऊंचाई पर चढ़ने से उसे लगता जैसे वह बादलों को छूने जा रही हो। पर बादल....? साईकिल जब टीले की पूरी ऊंचाई पर भी पहुंच जाती तब भी उतनी ही ऊंचाई पर ऊंघते हुए दीखते। अब साईकिल को फिर से नीचे ढलना होता तो नीचे जाती हुई सड़क पर वह बहती हुई-सी लगती। उसे लगता वह पानी में तैर रही है। वह साईकिल के ठीक विपरीत सीधा तन जाती बल्कि कुछ-कुछ पीछे की ओर ही झुक जाती। दीदी के लहराते बाल भी जैसे उसका पीछा करते। उनके खुले बालों में अपना चेहरा छुपाए वह फिर से सब कुछ भूलने लगती। बालों से आती भीनी-भीनी खुशबू उसके बाजुओं को थामकर उड़ा ले जाती....कहीं दूर।
यूं उसके सपनों का कोई अंत न था। पर जागते-सोते हर सपने के अंत में वह उड़ने लगती। कभी-कभी तो उसे लगता सचमुच ही उसके दोनों हाथों के पास दो नन्हें से पंख निकल आते। कोमल और चमकते हुए रंग-बिरंगे पंख। उसकी खुशी का ठिकाना न रहता। पल भर में ही वह उड़कर दूर निकल जाती......वहां तक जहां ‘सर्र..र’’ से गुजरती हवा भी ‘मह-मह’ महकती खुशबुओं में बदल जाती। वह दौड़कर खुशबुओं को समेट लेना चाहती। पर उसके पास जाते ही तैरते हुए खुशबुओं को सैलाब अचानक सिमटने लगता। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहता जब घनीभूत होती खुशबुओं को स्वंय के जैसी ही नन्हीं-नन्हीं परियों में बदलते हुए देखती। वह सबके साथ मिलकर हंसती-गाती और नाचने लगती।
दीदी के साथ जब वह साईकिल के पीछे बैठकर स्कूल जाती तो कभी-कभी ठीक से समझ नहीं पाती थी कि उस समय वह सचमुच ही स्कूल जा रही होती थी या स्वप्न में। क्योंकि दोनों ही स्थितियों में उसके नथुनों में दीदी के बालों की सौंधी-सी महक बराबर बनी रहती।
उसे ठीक से मालूम तो न था पर कभी-कभी उसे लगता..... शायद दीदी भी सपने देखती थी। मुख्य सड़क से उसके स्कूल की तरफ कच्चे रास्ते पर मुड़ने से ठीक पहले एक बाग था। साईकिल जब उस बाग के सामने से गुजरती तो यकायक दीदी के हाथ साईकिल के ब्रेकों पर कस जाते।
‘आ.... जरा सुस्ता लें।’
दीदी बगीचे में खिले हुए प्यारे-से फूलों के पास अपना चेहरा ले जाकर कुछ बुदबुदातीं और अपने गालों को कोमल-कोमल पंखुड़ियों से सहलातीं तो वह कुछ समझ न पाती। पर रात में जब सपने में दीदी अपने गालों को फूलों की पंखुड़ियों से छुआते हुए फुसफुसाती तो उनकी फुसफुसाहट को वह साफ सुन लेती। दीदी के बतियाने से फूल भी हंस-हंस कर बातें करने लगते। वह भी शर्माती हुई दीदी की बगल में जाकर खड़ी हो जाती।
‘ये चुन्नी...चुनिया है....’ दीदी फूलों से उसका परिचय कराती और कुछ ही देर बाद वह भी उनके साथ हंस-हंस कर खेल रही होती....भाग रही होती.... तितलियों-सी उड़ रही होती।
अब तो वह भी चाहने लगी थी कि स्कूल जाते हुए कुछ देर बगीचे में बैठ लिया जाए। हरी-हरी नाजुक-सी घास की पत्तियों पर नंगे पांव चलना उसे बहुत सुहाता। घास की पत्तियों के कोनों पर ठिठक कर रह गईं ओस की बूंदें जब धूप के चौंधे में मोती-सी चमकतीं तो वह फूली न समाती। चमकते हुए इन मोतियों में रोशनी से बनते-बिगड़ते रंगों को वह अपनी आंखें झपका कर देखती जाती। उसका मन करता कि इन सारे मोतियों को चुनकर अपने दामन में भर ले।
उस रोज भी वह दीदी के साथ थी। बगीचे के मेन गेट के ठीक सामने उन्होंने साईकिल खड़ी की और उसकी अंगुली थामे बगीचे में आ गयीं। धूप अभी पूरी तरह खिली नहीं थी। ऊपर आसमान में हल्के बादल थे जो छितराकर दूर-दूर ठहर गए थे। पर सरककर कोई एक टुकड़ा जब सूरज के ऐन सीध में आ जाता तो सीधी आती हुई धूप अचानक बिखर जाती। छिटकी हुई किरणें दूर ऊंचे-ऊंचे मकानों की मुंडेरों पर चिपक जातीं जैसे अचानक किसी ने चमकती हुई कतरनें बिखेर दी हों।
बगीचे में घुसते ही उसने अपने पांवों के जूते निकाल लिए और नंगे पांव घास पर दौड़ने लगी। झूले के पास पहुंची तो उस पर बैठकर झूलने लगी। मन फिर भटका और खाली पड़ी बेंच पर आकर बैठ गयी। इधर-उधर देखा। दूर कोने में खड़ी एक गुलाब की झाड़ी में नन्हीं चिरैया चिंचिया रही थी। वह उठी और सधे हुए कदमों से झाड़ी के नजदीक पहुंच गयी। चिंचियाने के साथ-साथ चिड़िया बार-बार अपनी गर्दन को भी घुमा रही थी। गर्दन को इस तरह घुमाने से कुछ-कुछ गहरे भूरे रंग के कोमल बालों के पीछे छुपा काला रंग उसकी गर्दन के चारों ओर एक पतली पट्टी के रूप में दीख पड़ता। वैसे उसकी छोटी-सी भूरी देह पर कुछ-कुछ काले रंग की पतली लकीरों के कारण एकदम से फैसला कर पाना मुष्किल था कि आवाज उसी की थी। हां.... उसकी हिलती हुई गर्दन और तेजी से घूमती हुई गोल-गोल आंखों से अवश्य अंदाजा लगाया जा सकता था।
उसकी आंख सिर्फ चिड़िया पर ही टिकी थी। जरा दूरी पर खड़े होकर वह उसे ध्यान से देखने लगी। पेंडुलम की तरह घूमती गर्दन के साथ-साथ चिड़िया अपनी छोटी-सी दुम को भी कभी-कभार ऊपर-नीचे पटक रही थी।
उसने अपनी ठुड्डी के नीचे हाथ रखे हुए आंखों में आंखें डाल दीं और गर्दन को चिड़िया की तरह ही घुमाने लगी। साथ ही चिड़िया की घूमती हुई आंखों की तरह स्वंय अपनी आंखों को भी घूमाना चाहा। पर आंखें ठीक से घूम नहीं पायीं। हां..इस प्रयास में उसकी पूरी गर्दन ही घूमते-घूमते अचानक ऊपर-नीचे हो जाती।
अभी वह फिर से प्रयास करने की सोच ही रही थी कि उसके कानों में दीदी के तेज-तेज बोलने की आवाज पड़ी। उसने फुर्ती से घूमकर देखा जहां दीदी खड़ी थी एक लड़का दीदी के पास खड़ा था। लड़का शायद जोर-जोर से कुछ कह रहा था पर उसे कुछ सुनाई न दिया। दीदी भी जोर-जोर से बोल रही थीं। उसे लगा, दीदी षायद गुस्से में थी। अचानक लड़का दीदी की ओर बढ़ा। दोनों हाथ उठाकर दीदी के चेहरे को अपनी बांहों में भर लेना चाहा। पर....
‘तड़ाकऽऽ....’
लड़के के गाल पर चांटा पड़ा तो वह सहम गया। दीदी की आंखों से चिंगारियां निकल रही थीं। लड़का अब वापिस लौट रहा था पर जाते-जाते जोर-जोर से कुछ कह भी रहा था। गुस्से में दीदी के नथुने फूल-पिचक रहे थे।
वह दौड़कर दीदी के पास पहुंची तब तक लड़का जा चुका था।
‘क्या हुआ दीदी....?’
‘............’
दीदी ने सिर्फ उसकी तरफ देखा पर कुछ जवाब न दिया। उसकी छोटी-सी समझ में अब तक कुछ नहीं आया था। दीदी की जलती हुई आंखों को देखकर वह सहम गयी थी और फिर से कुछ न पूछ सकी पर उसे लगा कि लड़के को वह पहचानती थी। अरे हां....... यह तो वही लड़का था जो इन दिनों रोज उन्हें रास्ते में कहीं न कहीं मिल जाता था। अपनी मोटरसाईकिल को उनकी साईकिल के साथ-साथ चलाते हुए दीदी से कुछ न कुछ कहता रहता। कभी-कभी शायद इंगलिश में कुछ फुसफुसाता जाता। हाथों से उनकी ओर इशारे करता रहता।
दीदी उसकी तरफ ध्यान न देती और साईकिल की रफ्तार बढ़ा देती। साईकिल जब कच्चे रास्ते पर ढल जाती तो वह पीछे मुड़कर देखती। लड़का अब काफी पीछे रह जाता और अपनी मोटरसाईकिल मोड़ रहा होता। पर कभी-कभी वह बाग के ठीक पहले ही मोटरसाईकिल को तेजी से चलाकर साईकिल के आगे लाकर रोक देता। दीदी के लिए अब उसके पास से निकलना संभव न होता। साईकिल को रोकते हुए दीदी दबी जुबान में मगर गुस्से से कुछ कहती। लड़का हंसते हुए अपना हाथ हिलाता हुआ अलग हट जाता। दीदी कुछ बड़बड़ाते हुए फिर से साईकिल पर सवार हो जाती पर वह कुछ समझ न पाती थी कि ऐसा क्यों होता था ? हर दूसरे दिन या कभी-कभी तो रोज ही ऐसा होता। उसने इन दिनों कुछ-कुछ महसूस किया......... शायद दीदी कुछ परेशान रहने लगी थी।
दीदी का गुस्सा अब कम हो चुका लगा उसे। हिम्मत करके उसने फिर से पूछ लेना चाहा........‘दीदी....यह वही लड़का था न....?’ पर दीदी के चेहरे पर पसरी पथरीली खामोशी से सहम गयी वह और शब्द होठों तक पहुंचने से पहले ही बिखर गए।
उसे स्कूल के गेट पर छोड़ते ही दीदी मुड़ गयी थी। सदा की तरह उसने ‘किस’ के लिए अपना गाल आगे किया पर दीदी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
वह चुपचाप स्कूल में आ गयी। अन्यमयस्क-सी इधर-उधर घूमती रही। सोनू....मोनू..... टिंकू..... सभी ने उससे बातें करनी चाहीं पर वह किसी के पास नहीं बैठी। घंटी बजी तो धीरे-धीरे चलकर क्लास में जा बैठी। पहला पीरियड श्रेया मैडम ही लेती। श्रेया मैडम उसे बहुत अच्छी लगतीं। पढ़ाते हुए वह जब अपनी गर्दन को बार-बार हिलातीं तो बालों की एक लट चुपके-से उनके गाल तक खिसक आती। वर्शा के ठीक बाद धुले-धुले आसमान-सी उनकी आंखों में इतना प्यार होता कि वह उसे दीदी-सी दिखतीं।
पर आज श्रेया मैडम पढ़ा कर चली भी गयीं और उसे पता तक न चला। खाने की छुट्टी होते ही सभी बच्चे अपना-अपना टिफिन-बॉक्स लेकर बाहर पेड़ों के नीचे जा बैठे थे पर उसने अपने टिफिन को छुआ तक नहीं।
दोस्तों ने उसे साथ चलने को कहा पर वह क्लासरूम में अपने स्थान पर ही बैठी रही। गुमसुम। पर भीतर ढेर सारे प्रश्न बींध रहे थे........‘वह लड़का कौन था...?’ ‘दीदी इतना गुस्सा क्यों थी ?’
रात को दीदी के घर गयी पर दीदी से मिल न सकी। दीदी की मां बता रही थी, ‘उसका सर भारी था..... दवा लेकर सो गयी है...’। सुनते ही वह भागकर दीदी के कमरे में गयी। दीदी रजाई ढांपे लेटी थी। पुकारना चाहा पर अचानक ‘दीदी परेशान होगीं’ सोचकर लौट पड़ी।
घर में आकर बिस्तर पर लेटी तो देर तक नींद नहीं आयी। आज उसे अजीब-सा लग रहा था। मां आयी और उसके साथ लेट गयीं। मां जानती थीं कि चुन्नी रोज कहानी सुनती थी सो कहानी सुनाना शुरू किया। वह कहानी सुनती रही और कभी बगीचे में और कभी दीदी के कमरे में भटकती रही।
नींद में वह अजीब-अजीब सपनों में घिरी रही। एक सपने में दीदी रो रही थीं। वह बार-बार दीदी की आंखों से आंसू पौंछ रही थी। पर जितना वह ढांढस बंधाने का प्रयास करती दीदी उतना ही अधिक फफक पड़ती। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे ?
एक दूसरे सपने में दीदी उसे छोड़कर जा रही थी। वह रोती-चिल्लाती उनके पीछे भाग रही थी। पर दीदी ठहरी नहीं, चली गयी।
एक और सपने में दीदी पंखे से लटक रही थी। उनकी दोनों आंखें उबल पड़ी थीं और जीभ बाहर लटक आयी थी। डर के मारे वह चीख पड़ी........
‘क्या हुआ ?’ मां ने उसे झिंझोड़ा और सिर पर हाथ फिराने लगी। वह मां के चेहरे की तरफ देखती रह गयी। कुछ समझ न सकी। चेहरे पर भय की लकीरें खिंच आयी थीं।
‘बुरा सपना आया था ?..... चलो अब सो जाओ....।’ मां ने उसे फिर से सुलाने का प्रयास किया।
रात में जरा बारिष हुई थी पर सुबह मौसम एकदम ताजा व खुला था। दूर-दूर तक बादलों के निषान तक न थे। धुला-धुला सा आसमान सूरज की पहली किरण के साथ ही चमक उठा था। वह उठी। पर रात की बेचैनी व अनिद्रा अब भी उसके चेहरे पर ठहरी थी। मां ने गर्म पानी कर दिया। वह नहा ली। बुझा-बुझापन जरा कम हुआ। तैयार होते-होते स्कूल का टाइम हो गया और वह अपना बस्ता थामे दीदी का इंतजार करने लगी।
एक बार उसे लगा षायद दीदी नहीं आंएगी। पर आंएगी क्यों नहीं.... अब तो सर ठीक हो गया होगा ! पर.... दीदी की नाराजगी ? वह फिर से उदास हो गयी।
दरवाजे के बाहर उसे साईकिल की घंटी सुनाई दी तो वह झट से खड़ी हो गयी। पैरों को पंख लग गए जैसे।
‘दीदी.....।’ वह भागकर दीदी की बांहों में झूल गयी। दीदी ने उसकी गाल पर किस किया तो वह खिल उठी। उनकी आंखों में झांका। साफ आसमान-सी आंखों में बीते हुए कल की गर्द का नामोनिशान तक न था। पर चेहरे की खामोशी से उसे लगा शायद दीदी अब भी कुछ परेशान थीं।
‘क्या हुआ था.... दी...दी।’ दीदी की आंखों में देखते हुए उसने फिर से पूछ तो लिया पर अचानक कठोर होते उनके चेहरे की तरफ देखकर वह सहम गयी। लगा चेहरे पर ठहरी खामोशी अचानक दहकने लगी थी। वह चुपचाप पीछे कैरियर पर बैठ गयी।
बगीचा आ गया था पर दीदी ने आज साईकिल को नहीं रोका। लोहे के गेट की झिरियों से उसने बगीचे के भीतर झांकने की कोशिश की। घास के होठों पर ठहरे मोतियों की लड़ियां उदास थीं। हमेशा दिप-दिप करते फूलों के चेहरे झुके थे। उसे लगा दूर कोने की झाड़ी में चिरैया आज भी बैठी थी पर ........चुप-चुप सी। उसकी गोल-गोल आंखें उन्हें गेट के सामने से गुजरते हुए देख रही थीं। उसकी इच्छा हुई एक बार भागकर बाग में हो आए। पर दीदी..? वह तो साईकिल को सरपट दौड़ाए ही जा रही थी। रोज तो वह पीछे मुड़-मुड़ कर उससे बातें करती रहतीं पर आज....। साईकिल के पैडलों पर रखे उनके पांव मषीन की तरह घूम रहे थे। चुप्पी के भीतर जो कुछ भी स्थिर होने को था, पांव की गति में उसे उंडेल देना चाहती हो जैसे।
साईकिल अब मुख्य सड़क के चौराहे से थोड़ी दूरी पर थी। उसने फिर से मुड़ कर देखा। गेट काफी पीछे छूट चुका था। मायूसी से उसने अपनी निगाहें हटा लीं और सड़क के सहारे दूर तक खिंची बगीचे की दीवार पर टिका दीं। अचानक उसे लगा दीवार के पीछे घास की नाजुक-सी पत्तियों के लरजते होंठ, रंग-बिरंगे फूलों के नन्हें से हाथ और चिरैया की मटकती हुई आंखें उसे इषारे से बुला रही हैं। उससे रहा नहीं गया। व्याकुल-सी निगाहों से उसने नजदीक आते चौराहे की ओर देखा। साईकिल को वहीं से ही कच्चे रास्ते पर ढल जाना था पर बगीचा.......? सोचकर वह बेचैन हो उठी। पीछे की ओर लहराते दीदी के दुपट्टे को तेजी से खींचा और पुकारा.......‘दी....दी.....’।
....उफ्फ.....!
आवाज उसके होंठों तक पहुंच ही न पायी होगी। तेजी से आती हुई एक मोटरसाईकिल जिस पर तीन युवक सवार थे, उनके ऐन करीब से गुजरी और पीछे बैठे युवक ने अचानक दीदी के चेहरे पर पानी-सा कुछ फेंक दिया।
साईकिल लहराई और गिर पड़ी। वह भी छिटक कर दूर जा पड़ी। उसकी समझ में कुछ न आया।
‘आंऽ....ईऽ ऽ’ उसे दीदी की चीख सुनाई दी तो वह फुर्ती से खड़ी हुयी पर उसके मुंह से चीख निकल गई। पांव में मोच आ गयी थी शायद। अपने पैर को घसीटते हुए दीदी की तरफ बढ़ी। वे लगातार चीख रही थीं और तड़प रही थीं।
भागती सड़क अचानक ठहर गयी।
‘गाड़ी नजदीक लाओ भई.....’ भीड़ में से कोई कह रहा था। भय और पीड़ा से कांपते हुए लगभग एक टांग के सहारे उसने भीड़ को चीर कर दीदी के पास जाना चाहा। पर पीठ पर झूल रहा बस्ता बार-बार लोगों की टांगों में उलझ रहा था। एक गाड़ी नजदीक लायी गयी तो भीड़ एक तरफ से फट गयी। दीदी ऐन सामने थी उसके।
‘नहीं.....ऽ ऽ ऽ....।’ उसके मुंह से चीख निकल गयी। सड़क पर पड़े हुए दीदी बुरी तरह से तड़प रही थीं। उनका चेहरा बहुत भयानक और डरावना दीख रहा था।
चेहरे, हाथों और दूसरे अंगों पर गिरे तेजाब का असर इतना गहरा था कि जगह-जगह से चमड़ी उधड़कर अलग हो गयी थी। गालों और ठुड्डी का मांस भी निकल आया था जो लटक कर उन्हें और भी वीभत्स कर रहा था। उन्हें इस हालत में देखते ही वह बेहोश होकर गिर पड़ी।
रात....दिन....और रात। समय गुजर रहा था पर वह अभी भी बेहोश थी। आज चौथा दिन था। इस बीच उसे पल भर के लिए होश आता। वह अपने चारों ओर बैठे मम्मी-पापा, चिंटू, मोनू और दूसरे लोगों की भीड़ के चेहरों की ओर विस्फारित नेत्रों से देखती। अचानक उसकी सूखी आंखों में सपने-सा एक दृश्य तैर जाता।
वह तेजी से साईकिल पर जा रही होती। हर पल उसके पैरों का दबाव साईकिल के पैडलों पर बढ़ रहा होता और साईकिल हवा से बातें करने लगती। ऊपर फैला आसमान जैसे उसके भीतर उतर आता और वह उड़ने लगती। सड़क के दोनों किनारों पर बने ऊंचे-ऊंचे मकान, पुलिया, पार्क और चौराहे, सब के सब तेजी से पीछे छूटते जाते। उसकी लाल चमकती हुई साईकिल अब ऊंचाई पर चढ़ रही होती। वह अपने पैरों को और अधिक तेजी से चलाना शुरू कर देती। पर अचानक....वह देखती, ढेर सारी मोटरसाईकिलों पर सवार युवक उसे घेर लेते। सबके हाथों में एक-एक खुले मुंह वाला डिब्बा होता। वह भयभीत हो जाती पर साईकिल को और तेजी से चलाकर बच निकलने का प्रयास करती। उसे ऐसा करते देख सारे के सारे युवक विद्रुपता से हंसने लगते और अट्टहास करते हुए डिब्बों का तेजाब उस पर फेंकने लगते।
‘नहीं....ऽ ..ऽऽ...।’
और वह फिर से बेहोश हो जाती।

Sunday, July 10, 2011

बिखरता आसमान

बिखरता आसमान


वह कृि ा उपज मंडी के अपने ऑफिस में बैठा था। मंडी में चने लेकर मोलू दादा आए थे। गांव के रिस्ते में वह उन्हें दादा ही कहता। उसने दादा को अपने ऑफिस में बिठाया और चाय मंगवा ली। गांव का हाल-चाल पूछा तो जैसे एक बार गांव ही हो आया। वैसे भी साल भर में एक बार तो हो ही आता है गांव में। गांव में उसका वोट है.......घर है पुश्तैनी। सच तो यह है कि वह अपने गांव से कभी अलग हुआ ही नहीं। आज तेरह साल होने को आए यहां ाहर में रहते पर नींद में सपने आते हैं उसी गांव वाले घर के। सपनों में गांव का पीपल का दरख्त दिखता है या वह बेंडी कीकर तले कुरां खेलता होता है। मोलू दादा वाले नोहरे की सीलन भरी दीवार के पास पेशाब करते हुए का स्वप्न तो जब कभी आ ही जाता है। आंख खुलते ही उसे अपने सपने पर हंसी आती है और कुछ देर तक वह यूं ही एक ओर देखता रहता है। हंसी के पीछे छुपी उदासी अचानक ही उसके चेहरे पर उतर आती है और उसकी आंखें दूर कहीं देखती हुई सिमटने लगती हैं। इस बार उसने पक्का ही सोच लिया था कि गांव में अपने घर और बाड़े की जगह का पट्टा बनवाकर 'हाऊसलोन` ले लेगा।
मंडी और गांव के मध्य अधिक दूरी नहीं है। दस कोस से भी कम ही होगी ाायद। लोग ऊंटगाड़े पर अपना माल ढोकर मंडी आते हैं। सांझ ढले लौटते समय खली -बिनौले, गुड़-तम्बाकू आदि ले जाते हैं। आम के आम और गुठली के दाम। गांव से आए लोग लगभग उससे मिलकर ही जाते हैं। किसके यहां ाादी है....कौन बूढ़ा आगे खिसक लिया, पूरी डाक रहती है उसे।
मोलू दादा ने बातों ही बातों में बताया, 'सरपंच मन्दिर बना रहा है।`
'किस ओर ?`
'शायद तुम्हारे घर और बाड़े का जिक्र है।`
सुनकर गुस्सा आया उसे। ऐसे क्या पोल है ? घर और बाड़ा तो बाप-दादा के समय से ही है। जब उसके दादा आकर बसे थे यहां, उसी समय से। गांव के नंबरदार ने बहुत आदर के साथ दी थी यह जगह ...'भाई हजारी, गांव राम होता है....काम की कमी नहीं है यहां। करने वाला चाहिए। वैसे तूझे कोई परेशानी नहीं आने दूंगा....जिंदा रहा तब तक तो...।`
दादा की याद उसे नहीं आती। ाायद उसके जन्म होते ही चल बसे थे...पर बाड़े में सूखते चमड़े की पटि्टयों में दादा की याद बस गई थी। सूखते हुए चमड़े पर हाथ फेरते हुए उसके पिताजी बताते... 'बहुत प्रेम था नंबरदार का। तुम्हारे दादा से तो उनकी खूब पटती थी। दादा की बनाई जूतियां तो ऐसी चि>ा चढ़ीं कि ठेठ पंजाब तक पहुंचा दी उन्होंने। नंबरदार की बड़ी वाली लड़की का ससुराल पंजाब में था। कहता..'यार हजारी, तुम्हारी बनाई जूतियों का जवाब नहीं। मजाल है जूती और पैर के बीच से सूई भी निकल जाए ! और वजन में....? अरे क्या कहने भई....ऐसी कि पैर अपने आप ही उठते चले जाएं।`
और अब सरपंच उसकी घर और बाड़े वाली जगह को छीनना चाहता है... पीढ़ियों के बाद ? और कोई जगह नहीं मिली उसे ? वह गुस्से से भरता गया भीतर ही भीतर। गांव से आए मोलू दादा कब के चले गए उसे पता ही नहीं चला।
ााम को घर आकर उसने पत्नी चम्पा को बताना चाहा पर कुछ सोचकर रहने ही दिया। लड़की कमरे में पढ़ रही थी। वह बाहर आकर आंगन में कुर्सी पर पसर गया।
'क्या हुआ ?` चम्पा पूछ रही थी।
'...कुछ नहीं। ...सिर में दर्द है, तू जरा चाय बनाले।`
रात में उसे देर तक नींद नहीं आयी। इधर-उधर की सोचता रहा। पास ही लेटी चम्पा काफी देर तक उससे बतियाती रही...फिर नींद ने आ दबोचा।
सुबह ऑफिस जाकर उसने आधे दिन की छुट्टी ले ली और गांव जाने वाली बस में चढ़ लिया। सरपंच घर पर ही था। कुछ देर तक इधर-उधर की बातें होती रहीं। असली बात पर आते ही सरपंच टाल गया...'भई मैं कौन होता हूं। मन्दिर तो गांव वाले बना रहे हैं। रही जगह की बात, तो सभी जानते हैं कि जगह तो तुम्हारी ही है। पर पंचायत के खाते में कहीं इन्द्राज है नहीं। कानूनन तो जगह अभी भी पंचायत की ही है। और पंचो का फैसला टाले भी कौन ! पट्टा तो मन्दिर के नाम बन चुका...।`
'पर...ऐसे कैसे हो सकता है ?` वह अपने गुस्से को दबाए हुए था।
'क्यों ? होगा तो वही जो पंच चाहेंगे !`
'गांव से क्यूं....देस से ही निकाल दो न....` वह कहना चाहता था पर भीतर ही भीतर तिलमिला कर रह गया। वह समझ गया कि सरपंच उसकी सुनने वाला नहीं। उठ कर वह बाहर आ गया।
सरपंच के घर से निकलते-निकलते उसे काफी देर हो गई थी। पर ाहर जाने वाली बस के जाने में अभी समय था। उसका जी चाहा कि एक बार अपने घर व बाड़े तक हो आए। दो कोठड़ियों का उनका घर बरसों से बंद पड़ा था। खंडहर होता। टेड़ी-मेढ़ी ाहतीरों पर लटकती बल्लियां और सीलन भरी दीवारें जैसे अभी भी किसी के आने का इंतजार कर रही थीं। तेरह साल पहले जब वह ाहर गया था तो कई-कई घंटों तक दीवारों पर अपना हाथ फिराता रहा था...जैसे रोम-रोम में घर को समेट कर ले जाएगा। बाड़े के जीर्ण कांटे भी कई-कई दिन तक उसके भीतर चुभते रहे थे।
ाहर में महीने भर चक्कर लगाते-लगाते उसे एक किराए का घर मिला। घर क्या था....बस एक कमरा और एक छोटी-सी रसोई। रसोई से चिपकी हुई कच्ची 'लैट्रीन` और 'बाथरूम`। आंगन के नाम पर मुश्किल से दो चारपाई बिछ जाने की जगह ही।
ाुरू-शुरू में उसे मितली-सी आती रहती। रात को देर तक उसे नींद नहीं आती। आती तब सपनों में फिर से गांव के अपने घर में जा पहुंचता। सुबह उठता तब बहुत देर तक अपनी आंखें फाड़-फाड़कर कमरे की दीवारों की ओर देखता रहता। भीतर एक उदास भाव उतर आता।
कई महीनों के बाद तक वह किसी दूसरे घर की तलाश में घूमता रहा। ाायद कोई घर अपना-सा लगने लगे। पर ऐसा हुआ नहीं। कहीं अगर कमरा कुछ खुला-खुला होता तो बाथरूम बना ही नहीं होता। रसोई होती मगर छोटी सी, जो जीने के नीचे छूटी खाली जगह को घेरकर बनी होती। किसी घर का किराया दो गुना-चार गुना होता तो किसी जगह कोई दूसरी समस्या आड़े आ जाती। आखिर उसने सोचा, यही ठीक है। पत्नी तो बेचारी पहले से ही खुद को ढाल चुकी थी। छ: महीने बहुत होते हैं। औरत को तो छ: दिन ही काफी !
'मैं तो आपसे रोज ही कहती हूं...आखिर क्या कमी है इस घर में ? अच्छा भला मौहल्ला है...गांव के जैसा। दीपू की मम्मी, दिया की मम्मी और वो गिरदावर जी की मम्मी तो खूब लाड़ करती है हमारा.....'ना ना मौहल्ला छोड़ कर मत जाना...!`
'लो फिर ....नहीं छोड़ेंगे भई !`
कहने को तो उसने कह दिया पर अभी भी वह ऑफिस से घर लौटता तो उसे लगता किसी अनजान घर में आ गया हो जैसे।
रात को घर के छोटे-से आंगन में आसमान का एक छोटा-सा टुकड़ा दिप-दिप करता हुआ ऐन उसके सिर पर होता। इस कोने से उस कोने तक तारों से भरा। वह टकटकी लगाए अपनी चारपाई पर लेटा रहता। ऊपर आसमान में अजगर की नांईं लेटी आकाशगंगा करवट बदल लेती पर उसकी आंखों में नींद नहीं आती। पास ही चारपाई पर लेटी चम्पा बच्ची को सुलाते-सुलाते कब की सो चुकी होती। वह सिर पर टंगे आसमान में न जाने क्या ढूंढता रहता। आखिर रात की जवानी के साथ-साथ उसकी पलकें भी ढल जाती। थोड़ी देर बाद ही वह एक बार फिर से आसमान के बीच होता। हां... अपने स्वयं के आसमान के बीच।
उसका स्वयं का एक आसमान था। छोटा सा। और था थोड़ा सा पानी, हवा और मुट्ठी भर धूप..... साथ में थे ढेर सारे सपने। यूं उसके पास वह सबकुछ था जो उसके जीने के लिए जरूरी था। पर जब से उसकी छोटी-छोटी चिरमी-सी आंखों में सपने तैरने लगे थे, ठीक उसी दिन से न जाने कितनी बार यह आसमान सिकुड़ता-फैलता रहा था।
स्कूल से घर आते ही वह अपना बस्ता रखकर बाहर निकल पड़ता। 'नैणोवाले` जोहड़ या 'पूनणीवाले` मैदान की तरफ। लड़के क्रिकेट खेल रहे होते। एक कोने खड़ा- खड़ा वह उन्हें देखता रहता। कभी कोई लड़का कम होता उस रोज उसे खेलने दिया जाता। गेंद कुछ जल्दी नहीं पहुंचती या पैरों के पास से निकल जाती तो सब के सब उससे झगड़ा करते। प्रत्यक्ष में वह कुछ न कह पाता पर भीतर ही भीतर दुखी हो जाता। उसकी आंखों के सपने अचानक रौंद दिए जाते। गर्दन झुकाए वह घर लौटता तो मां सब कुछ समझ जाती.....'दुखी मत हो बेटा ! गेंद जरा जल्दी से पहुंचा दिया कर....।` मां उसके सिर पर अपना हाथ फेरते हुए कहती।
'पर मां....वे बड़े-बड़े लड़के हैं।`
मां मुस्कुरा देती।
दिन जाते पता नहीं चलता। वह दसवीं कक्षा में था। 'बोर्ड` के पेपर थे। उसका सेंटर फेफाना गांव में था। तैयारी खूब थी। सालभर जमकर याद किया हुआ 'मैटर` उसने एक बार फिर से देख लिया था। उसे ही क्या सारे अध्यापकों को भी भरोसा था कि वह मेरिट में तो आएगा ही।
उसके रोल नंबर स्कूल के हॉल में थे। परचा देखते ही वह फूल-सा खिल गया। सारे के सारे सवाल उसे अच्छी तरह से याद थे।
अभी आधे सवाल ही हल किए होंगे कि उसके एक दम पीछे बैठे दढ़ियल-से लड़के ने फुसफुसाते हुए उससे कुछ कहा। उसने मुड़कर लड़के की ओर देखा तक नहीं। बस अपने काम में लगा रहा। पर पीछे वाला लड़का ाायद अब उसकी पीठ में अपनी अंगुली चुभो रहा था। वह कुछ और आगे सरक गया। लड़का इस बार कुछ तेज आवाज में बोला...'सवाल बता !`
सुनकर भी उसने कोई जवाब नहीं दिया और अपने सवाल हल करता रहा। पेपर का समय खत्म होने में अभी कुछ समय ो ा था। पीछेवाले लड़के ने उठकर अपनी कॉपी पकड़ाई और हॉल से बाहर निकल गया। उसकी जान में जान आयी। बचे हुए सवालों को उसने आराम से हल कर लिया। पेपर खत्म होने के बाद वह स्कूल के गेट से बाहर निकल ही रहा था कि हक्का-बक्का रह गया। दढ़ियल लड़का गेट के पिल्लर की ओट से अचानक निकल कर उसके सामने आया और उसकी कॉलर पकड़ ली....'पेपर सही- सलामत देने की इच्छा नहीं है क्या ?` उसने विरोध करना चाहा पर आवाज भीतर ही कहीं 'गूं..%%..गूं` होकर बिला गई।
इसके बाद वह अपना पेपर जल्दी से हल करने के बाद दढ़ियल लड़के को पकड़ा देता। पेपर लेने वाला अध्यापक उसकी ओर देखता और मुस्कुरा देता। पहले ही दिन उसने हैडमास्टर से शिकायत करनी चाही थी पर साथ वाले लड़कों ने बताया, 'थानेदार का लड़का है....`। वह मन ही मन घुट कर रह गया। पेपर खत्म होने के बाद घर पहुंचा तो मां-पिताजी के सामने फफक पड़ा। गुस्से और खीज से भरी उसकी बेंत-सी देह देर तक हिलती रही। पर होता क्या ? हांडी के उबलने से किसी का क्या बिगड़े....खुद उसी के किनारे ही तपते हैं....।
पर होता यंू कि जब-जब उसके सपने मसले जाते और भीतर पसरा दिपदिपाता आसमान खरगोश की नांईं सिमट जाता तो मां-पिताजी की आंखों में तैरता पुचकार भरा पानी धीरे से बाहर ढलक आता और उसके भीतर जैसे एक निश्चय अपने पैरों पर फिर से खड़ा होने लगता। सबसे अलग और आगे निकल जाने का उत्साह उसे रात के एक- एक बजे तक जगाए रखता। बड़ी-बड़ी किताबों के एक-एक ाब्द उसके भीतर उतरते जाते....और...भीतर के सपने बाहर की ओर उड़ान भरने लगते..। दूर....बहुत दूर तक।
यहां तक कि उड़ते-उड़ते वह आई.ए.एस. की परीक्षा तक पहुंच गया। बड़े नंबरों वाली ऐनक के पीछे उसकी आंखों में छलांग लगाते सपने थे और सामने थी एक मंजिल। पर इंटरव्यू तक पहुंचते-पहुंचते उसके सपनों के होंठ ढलक जाते और मंजिल कहीं दूर खिसक चुकी होती।
इंटरव्यू लेने वालों के एक के बाद एक बेमतल के सवालों से उसे निश्चित तौर से पता चल गया था कि वे महज उसे घेरना चाहते हैं। उसकी बेंत-सी देह...मां-बाप और उसकी जात पर टिप्पणी करने का उद्देश्य साफ समझ में आ गया था उसे।
घर आकर कई दिनों तक सहज नहीं हो पाया था वह। मां...? मां तो मां ही होती है...'हौसला रख बेटा....सोने के जंग नहीं लगता...।`
एक बार फिर से तैयार था वह। पर दूसरी और तीसरी बार इंटरव्यू तक पहुंचा तो उसके सपनों की पांखें बिल्कुल ही टूट गईं। टूटी हुई पांखों से कई-कई दिनों तक लहू चूता रहा।
धीरे-धीरे उसकी समझ में आ गया कि आसमान भले ही कितना ही खुला क्यों न हो उड़ान की सीमा तय करनी ही पड़ती है।
और यूं कृि ा उपज मंडी में बाबूगिरी से ही खुश था वह.... ाायद ? चाहे जो हो, रोज बिखरता-संहृत होता आसमान था तो सही ! हवा, पानी और धूप जो कुछ भी था अपना स्वयं का था।
पर अब बरसों बाद उसका छोटा-सा स्थिर आसमान ाायद फिर से हिल गया था। गांव से लौटने के बाद फिरते-फिराते दो-तीन दिन यूं ही निकल गए। आखिर उसने सरपंच के खिलाफ केस ठोक दिया। मांगी वकील उसका जिगरी था।
'पगला है तू ! अपनी जगह कोई नहीं ले सकता....।` मांगी ने चुटकी बजाकर कहा तो उसे कुछ धैर्य हुआ।
'पर मेरे पास जगह के कागज तो नहीं हैं ?`
'कब्जा तो पुराना है ?`
'पुराना कितना कहूं.....दादा के समय का है।`
'तो बस ! बाकी सब कुछ मुझ पर छोड़ दे।`
आने वाले इतवार को एक बार फिर से वह गांव जाने की सोच रहा था। आशाराम दादा और बनवारी काका से भी तो मिल लेना चाहिए ! आखिर वे ही कुटुम्ब के नजदीकी लोगों में से हैं। क्या हुआ जो गांव के उ>ार में जाकर नयी बस्ती में बस गए ! जड़ें तो हमारे घर-बाड़े के पास की ही हैं.....! उसके मन में आगे की रणनीति बन रही थी। पर दोपहर होते-होते ऑफिस में सरपंच का फोन आया...'लल्ला केस उठा ले।` सुनकर उसे गुस्सा आया कि साले धतींगड़ को खरी-खोटी सुना दे पर कुछ सोचकर उसने फोन रख दिया।
इतवार को सुबह-सुबह ही वह रोज की तरह घूमने निकला पर जल्दी ही लौट आया। सोचा जरा गांव की तरफ हो आऊं...।
सूरज निकलने में अभी देर थी। लौटकर उसने बाहर के दरवाजे को बंद किया पर कुंडी नहीं लगाई और आंगन में चला आया। बच्ची अभी सो रही थी। चम्पा ाायद चाय बना रही थी। उसने नहा लेने की सोची पर इतने में ही बाहर किसी जीप के आने की आवाज सुनाई दी।
'कौन हो सकता है ?` उसने चम्पा से बतियाने की गरज से पूछा।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। वह दरवाजे तक गया पर दरवाजा तो खुला ही था। मुंह पर कपड़ा लपेटे चार-पांच लोग जबरदस्ती भीतर आंगन में घुस आए।
'क...कौन हो तुम ?` उसने जल्दी से पूछा पर पूरी बात कहने से पहले ही उनकी टांगों में उलझ कर रह गया। हिम्मत कर फिर से उनके सामने होने की कोसिस की तो एक ने उसकी गर्दन पकड़ ली। दूसरे ने उसके दोनों हाथों को पीछे मरोड़ते हुए कमर पर घुमा दिया। वह दर्द से बिलबिलाता रहा पर गले से 'घुर्र....घुर्र` की आवाज निकल कर रह गई। लगा आंखें बाहर की तरफ उबल पड़ेंगींं। टेंटुआ थामने वाले व्यक्ति ने लगभग उसे उठा रखा था। उसने उसे पहचान लेने की कोसिस की। वह सरपंच के परिवार के लड़कों में से ही एक था। उसने अपनी लगभग बाहर निकल चुकी आंखों से दूसरे लोगों को देखना चाहा पर तभी चम्पा उनके बीच में आ गयी.....। एक आदमी ने उसका बाजू पकड़ा और दूर छिटका दिया। उस आदमी ने अपनी बेल्ट से चाकू निकाला और चम्पा की ठौड़ी पर धर दिया.....'तेरे खसम को समझा ले...जीना नहीं चाहता क्या ?`
वे जितनी तेजी से आए थे उतनी ही तेजी से चले भी गए। दरवाजे के किवाड़ अभी तक आगे-पीछे झूल रहे थे और....। उसके भीतर जैसे सबकुछ जड़ हो गया था। बरसों से बिखरता-संहृत होता आसमान अब चौतरफ बिखरा पड़ा था। कहां हवा थी, कहां पानी.....कुछ पता नहीं।




पूर्ण ार्मा 'पूरण`
प्रा०स्वा०के० रामगढ़
त० नोहर जि० हनुमानगढ
राजस्थान-३३५५०४



Tuesday, November 30, 2010

धीवड़ नै सीख

मराठी कहांणी

धीवड़ नै सीख
मूल- सांईनाथ पाचारणे
अनुवाद- पूर्ण ार्मा 'पूरण`

भाख पाटंणंनै ई ही कै तारा रै रूड़ उठंण लागी। उण रै पेट मांय जांणै वीज रौ कड़ड़ाट उठै हौ। 'अरया ई` कैंवतां थकां वा ऊभी हुयगी। कामळियै नै पासै सरकाय दोंनूं हाथां सूं आपरौ पेट थाम्यौ तौ मूंड़ै सूं चिरळी नीसरगी अर मूंडै माथै पीड़ री लकीरां मंड आयी। कीं ताळ पछै पेट मांय वा वीज ओजूं कड़ड़ाई। अबकाळै उण री चिरळी घंणी जोर सूं ही। कनै ई उण रौ घरधंणी दसरथ सूत्यौ हौ। तारा री चिरळी सुंण वौ जागग्यौ।
''कांई हुयौ ?`` वंण पूछ्यौ।
''पेट मांय रीळ चाळै।`` तारा कैयौ।
''कद सूं ?``
''घंणी ई ताळ सूं। थारी नींद मांय भिचोळ नीं पड़ै इण खातर थांनै जगायौ कोंनी। समझ मांय कोंनी आवै....कांई करूं ?`` उण रै मूंडै पीड़ री लकीरां ओजूं मंड आयी अर वंण दसरथ कांनी देख्यौ।
''पांणी मांय सोडौ रळाय पीवंण नै देवूं कांई ? का बिंना दूध री चाय बणायंनै झलावूं ?`` दसरथ टाबरां री ढाळ पूछ्यौ।
''थे जकी समझौ हौ बिसी पीड़ कोंनी म्हारै।``
''तौ ?``
''अबैं थांनै कियां बतावूं ? अबार म्हारै टाबर हुवंणवाळौ है.... आ उण री ई पीड़ है।``
दसरथ हांस पड़्यौ। पछै आपरै सिर माथै थाप मारतां बोल्यौ, ''आ बात तौ म्हैं सोची ई कोंनी।``
''थे थारी मां नै जगावौ।`` तारा बोली।
दसरथ फुरती सूं ऊभौ हुयग्यौ। आपरौ कामळियौ पगां सूं परै धक दियौ अर भाजंनै बारै आयग्यौ। बारंणौ खोल वौ आंगणै मांय आयौ।
हाल तांई भाग तौ पाटगी ही पंण मूंअंधारौ हौ। घराळा सैंग आंगंणै मांय सूत्या हा। गाढी नींद मांय। अेक ई बिछावंणै मांय सूत्या सगळा अेक दूजै रै चिप्यां सूत्या हा। बायरै मांय ठंड ही। ठंडी पूंन लाग्यां दसरथ भेळौ-भेळौ हुवै हौ पंण हाल ठंड री चिंत्या करंण रौ बखत नीं हौ। भीतर तारा हाल-बेहाल हुयरी ही। वौ आपरी मां कंनै गयौ अर धंधोळतां थकां कैयौ, ''मां जाग..... जाग मां !``
दसरथ री बोली सुंण मां जागगी। उतावळी-सी ऊभी हुय दसरथ सूं पूछ्यौ, ''कांई हुयौ रै दसरथ ?``
''तारा रै पेट मांय रूड़ उठरी है।``
''....हैं ? कद सूं ?``
''घंणी ई ताळ सूं।``
''तौ बेटा..... पैलां क्यूं नीं जगायौ म्हंनै ?``
चंदरोबाई फुरती सूं ऊभी हुयगी। आपरै डील माथै साड़ी सावळ करी अर घर रै मांय जावंण लागी। उण बखत उण रै कांनां मांय तारा रै टसकंण री आवाज पड़ी। उण मंन-मंन ई सोच्यौ? '....ब्होत दुख पांवती हुयसी बीनंणी..।` पछै वा बेटै कांनी मंूडौ फोरंनै बोली , '' थूं इंयां क्यूं ऊभौ है....खंबै दांई ? जा कोई गाडी-गूडी रौ सराजांम कर। उण नै सफाखांनै मांय ले जावंणौ चाइजै।``
''इण वेळा किंण री गाडी ढूंढूं। अबार दिंन उगाळी ई कोंनी हुयौ।`` दसरथ दाझतौ-सौ बोल्यौ।
''चायै किंण री ई देख। किंण ई नै हेलौ पाड़, इस्यै बखत मांय कोई नटै कोंनी। अर हां.... उण नै उतावळ करंण री कैय देयी। भलां ई भाड़ै रा दौ पीसा बेसी लाग जावै।``
''काळू नरकै री गाडी देखूं दखां।`` दसरथ बोल्यौ।
''जा जा... देखै वा ई देख, पंण जा तौ सरी।``
इतंणौ कैय चंदरोबाई भीतर आपरी बीनंणी कंनै गयी अर दसरथ बारै। इस्यै अंधारै मांय आंगंणै सूं ढळतां ई वौ काळू रै घर कांनी ढणकां हुय लियौ।
दसरथ रै औ पैलीपोत रौ कांम पड़्यौ है। उण री जोड़ायत रै पैलीपोत रौ टाबर हुंवणवाळौ है। दसरथ अर तारा रौ ब्याव हुयां नै दौ साल हुयग्या। नौ महींना पैलां तारा जद दसरथ नै आ आछी खबर दीवी कै वा उण रै टाबर री मां बणणवाळी है तद दसरथ उमाव सूं भरीज्यौ। आपरौ अंस तारा रै पेट मांय पळै इण बात सूं वौ घंणौ राजी हुयर्यौ हौ। बियां ब्याव रै बखत तारा दसरथ सारू कोई अणचौबड़ छोरी कोंनी ही। तारा उण रै मांमै री बडोड़ी छोरी ही। दोंनूं अेक-दूजै नै टाबरपंणै सूं ई जांणै हा। उनाळै री छुटि्टयां मांय दसरथ जद मांमै रै अठै जांवतौ तद वै दोंनूं साथै-साथै खूब खेलता पंण खेलंण सूं ब>ाा चड़भड़ता घंणा हा। इयां चड़भड़तां-चड़भड़तां ई वै जुवांन हुयग्या। आं ई दिंनां मांय सरंमा-सरंमी अेक-दूजै नै चावंण लाग्या। सेवट अेक दिंन ब्याव री चंवरी आय ऊभा हुया। ब्याव पछै घरवाळा सूं ओलै-छांनै जकौ कीं हुंवतौ रैयौ वौ सौ कीं आज लोगां रै साम्ही चौड़ै हुवंण वाळौ है, दसरथ नै इण ई बात माथै रीस आवै ही। '... माड़ी हुयी बटी.... माड़ी` दसरथ खाकौबिळळौ सौ आपरी नाड़ हलांवतां थकां फटक....फटक अंधारै मांय बगै हौ। मंन ई मंन बातां करतौ। औचट गैलै मांय आपरी पूंछ मांय मूंड़ौ घाल्यां बैठ्यै अेक गंडक माथै उण रौ पग मेलीज्यौ। गंडक 'कोय...कोय` करतौ पासै भाजग्यौ। अचाणचक ई गंडक री 'कोय....कोय` सुंण दसरथ हाकौ-धाकौ रैयग्यौ। काळजौ फड़कै हुयग्यौ। बियां तौ हेठै पड़तौ-पड़तौ बचग्यौ पंण फेर ई वंण गंडक नै भूंडी-सी गाळ ठोकी अर आगींनै चाल पड़्यौ।
गांम हाल तांईं सूंत्यौ पड़्यौ हौ। काळू नरकौ गरंमी सूं आखतौ घरां आंगंणै मांय तुलछी-पलींडै सारै सूत्यौ हौ। उण री काळी-पीळी गाडी आंगंणै रै साम्ही ऊभी ही। धामंण गांम सूं लेय मोरवाड़ी तांईं वौ लोगां नै ढोयां फिरतौ। इण सूं ई उण रौ टाबर-टापरौ पळै हौ। धंधौ चालै ई सावळ हौ अर वौ चलावंणौ ई जांणै हौ। आधी रात कुंण ई बुलावौ, काळू निधड़क उण रै साथै हुय जांवतौ।
गाडी लावंण सारू दसरथ रै साम्ही सैंग संू पैलां काळू रौ ई चैरौ आयौ। वौ झांझरकै पैलां ई काळू रै घरां आया हेलौ पाड़ै हौ।
''काळू.....औ.... काळू।``
काळू री आंख खुलगी। कामळियौ सरकाय पूछ्यौ।
''कुंण ?``
''म्हैं हूं.... दसरथ।``
'' किंयां रै दसरथ..... इत्तै झांझरकै ई.... कांईं बात है ?``
''गाडी लेयंनै चाल..... म्हारी जोड़ायत नै सफैखांनै ले जावंणौ है।``
''सफैखांनै ?`` काळू इचरज सूं पूछ्यौ।
''और कांई .... मींदर जावंण सारू कैयौ है थंनै ?`` दसरथ तमकतां थकां कैयौ। काळू नै लाग्यौ उण री आवाज मांय तमक है। वौ बोल्यौ ''तमकै क्यूं है ? म्हैं तौ इंयां ई पूछ्यौ हौ।``
''तौ फेर ? म्हैं इसी भाखपाटी क्यूं आयौ थारै कंनै ?``
''किस्यै सफैखांनै ले जावंणौ है ?`` काळू पूछ्यौ।
''थूं ऊभौ हौ पैलां। गाभा पैहर अर गाडी काढ, पछै सौ कीं बता देस्यूं। घरां म्हारी जोड़ायत कुरळायरी है। ....वा पूरै दिंनां है। ``
काळू हांस्यौ। कामळियौ पासै करंनै वौ ऊभौ हुयग्यौ। हांसतां-हांसतां दसरथ सूं कैयौ, '' थारै कारंण ई उण लाई री आ हालत हुयी है। ब्याव पछै अेकलौ बीनंणी नै लियां घूमंण गयौ हौ। कदे अठै तौ कदे बठै। उण नै रांम रौ दरस करायौ। कानूड़ै रौ दरस करायौ। वै दोनूं थारै माथै क्यूं कोंनी राजी हुवै ?``
कैयां पछै काळू मांय गयौ पंण दसेक मिनट पछै हाथ-मूंडौ धोय, गाभा पैहर बारै आयग्यौ। दसरथ रै तालामेली हुयरी ही। उण नै अेक-अेक मिनट री उतावळ ही। काळू माथै रीस आयी पंण करै कांईं।
बारै आय काळू आपरी गाडी टोरी अर दसरथ सूं बोल्यौ, '' आज्या बैठज्या उतावळी-सी......``। दसरथ उतावळी-सी गाडी मांय बैठग्यौ। काळू गाडी नै दसरथ रै घर कांनी भजादी।
गाडी पूगगी। घर रै आंगंणै रै अैन सारै। दसरथ गाडी सूं कूद पड़्यौ अर काळू सूं कीं कैयां पछै आंगंणै मांय भाज्यौ। मांय तारा हाल ई चिरळी मारै ही। उण री मां आपरी बीनंणी नै धीर बंधावै ही, ''थोड़ी थ्यावस कर.... इंयां नां कर बेटी ! जरड़ी भींच ! लुगाई रै भाग मांय औ ई सौ कीं हुवै।``
''आग लागै इस्यै भाग रै`` तारा कुरळांवतीं-कुरळांवतीं दसरथ नै गाळ ठोकै ही।
उण ई बखत दसरथ आंवतां थकां कैयौ, ''मां उतावळ करौ ! गाडी बारै ऊभी है।``
दसरथ री मां चंदरौ बाई आपरी बीनंणी नै कैयौ, ''चाल ! उतावळ कर..... मंूडौ धोय ले, गाडी आयरी है।``
''चालौ`` कैय तारा ऊभी हुयगी। उण रै पेट री रूड़ इब बधगी ही। चंदरोबाई उण रौ बूकियौ पकड़ राख्यौ हौ। तारा उण रौ सारौ लेय ई चालै ही। उण चळू-अेक पांणी चेरै माथै नाख्यौ अर साड़ी रै पल्लै सूं पूंछ लियौ। पछै गाडी कांनी चालंण लागी। उण रौ सूंधौ हाथ दसरथ अर ऊंदौ हाथ चंदरोबाई थांम राख्यौ हौ। दोनूं पासै रै सारै तांण तारा आंगंणै ढळ गाडी कंनै पूगगी। तद तांईं काळू तींन-च्यार बरियां गाडी रौ होरंण बजा दियौ हौ। होरंण सूं आंगंणै मांय सूत्या और लोगां री नींद खुलगी। तारा री नणद ई जागगी। तारा कुरळावै ही। दसरथ नै उण रौ कुरळावंणौ चोखौ कोंनी लागै हौ। दिनुगै-दिनुगै नींद मांय भिचोळ पड़्यां, पैलां ई वौ फळीबंट हुयर्यौ हौ। इब तारा नै इंयां कुरळांवतौ देख बोल्यौ, ''चुप रै....क्यूं कंठ पाड़ै ? दीसै कोंनी कांई..... सगळा जागर्या है।`` चंदरोबाई नै दसरथ रौ रीसांणौ हुवंणौ चोखौ कोंनी लाग्यौ। बोली, ''थूं क्यूं रातौ हुवै उण माथै ! दीसै कोंनी बिच्यारी कितंणी दुख पावै.....! रोयां कांई मजौ आवै उण नै ?``
दसरथ चुप रैयौ।
पछै दोनुवां तारा नै गाडी मांय बिठायौ। चंदरोबाई तारा रै कंनै बैठगी। उण तारा रौ सिर आपरी झोळी मांय ले लियौ। तारा री नणद अेक कामळियौ लायंनै आपरी भावज नै दियौ। दसरथ काळू साथै बैठग्यौ। उण काळू नै गाडी टोरंण रौ कैयौ।
''थोड़ी हळवां.......।`` चंदरोबाई बोली।
काळू होळै-होळै गाडी चलावै हौ। पक्की सड़क माथै ई वंण गाडी चांपी कोंनी। तारा रै पेट मांय अबैं पैलां सूं घंणी रूड़ आवंण लागी। पीड़ रै कारंण वा आपरी नाड़ मारै ही। हाथ-पगां नै हलावै ही। बिचाळै ई दोंनूं हाथां सूं आपरौ पेट थांमै ही। कुरळांवती-कुरळांवती चिरळी मारै ही,....''औ रै मावड़ी....मरगी।``
चंदरोबाई उण नै धीर बंधावै ही।
''जी नां हला..... सौ कीं सावळ हुयसी..... अबैं सफाखांनौ नेड़ै ई है...... हिम्मत राख....।``
कैवंणौ सोरौ। तारा रौ हाल देखीजै कोंनी। कित्तीक हिम्मत राखै। अेक मोड़ माथै तौ उण रै पेट मांय जोर सूं वीज कड़ड़ाई। उण जोर सूं चिरळी मारी अर दोंनूं पग पसार दिया। पछै बेचेत हुयगी। चंदरोबाई रौ काळजौ जिग्यां छोड़ग्यौ। उण काळू नै गाडी थामंण रौ कैयौ। काळू गाडी थांमी अर पूछ्यौ, ''घंणी तकलीफ हुवै कांई ?``
''हम्बै ! लागै..... पूगंणै सूं पैलां ई टाबर हुयसी।``
पछै उण दसरथ सूं कैयौ ,''लाडी, बारै देख दखां ! किंण ई रौ घर का दरखत हुयसी जकै रै लारै तारा नै लेय जावूं।``
''अठै किस्यौ दरखत है ? घर ई किंण रौ हुवै हौ अठै ? अर जे हुवै ई तौ वौ क्यूं आपां नै खुद रै घरां बड़ंण देसी ?`` दसरथ बोल्यौ।
''देख तौ सरी।`` चंदरोबाई ओजूं कैयौ।
दसरथ हेठै उतरग्यौ। उण आपरी जिग्यां ई ऊभौ हुय इन्नै-बिन्नै ख्यांत्यौ तौ थोड़ी दूर दौ-तींन घरां री ढांणी दीसी। हाल तांईं दिंन ऊग्यौ कोंनी हौ। ढांणी रा लोग नींद सूं जाग्या ई हा। दसरथ बिंना कीं सोच्यां उण ढांणी कांनी भाज्यौ। उरलै पासै पैलीपोत रै घरां साम्ही बारंणै मांय जाय हेलौ पाड़्यौ, ''घरां कोई है कांईं ?``
दिनुगै पैलां कुंण आयौ है औ देखंण सारू अेक बूढळी बारै आयी। उण आपरै बारंणै माथै ऊभ्यै दसरथ नै देख्यौ अर पूछ्यौ, ''कुंण....? किंण नै देखै हा ?``
दसरथ अड़वड़तां थकां कैयौ, ''बडकी.... थोड़ी इमदाद चाइजै ही ! म्हे तौ रासै मांय पजग्या।``
''कांईं इमदाद चाइजै ?``
''म्हे नंद गांम सूं आया हां। म्हारी जोड़ायत रै टाबर-टीकर बापरंण वाळौ है। उण रै रूड़ माथै रूड़ सरू हुयरी ही इण खातर म्हे उण नै मोर गांम रै सफैखांनै लेय जावै हा पंण गैलै मांय ई वा बेचेत हुयगी। लागै स्यात टाबर तौ गैलै बिचाळै ई हुयसी। जे थारै घर-चौभींतै मांय आसरौ मिल जावै तौ ......``
कैंवतां-कैंवतां दसरथ गळगळौ हुयग्यौ। इंयां लाग्यौ जांणै वौ अबार ई रोवंण ढुकसी।
डोकरी नै दसरथ माथै दया आयगी। दर ई नीं सोच वा बोली, ''हां...हां, उडीक किंण बात री ? जावौ अर उतावळी-सी उण नै मांय ले आवौ। औ थारौ ई घर है। संकौ करंण री कांईं बात ?``
दसरथ नै डोकरी री बातां आसरीवचंन-सी लागी। वौ उतावळी-सी भाजंनै गाडी कंनै आयौ अर बोल्यौ, ''मां चालौ, उतावळ करौ। तारा नै हेठै उतारौ। वा बडकी तौ ब्होत भली लुगाई है। वंण तारा नै मांय लावंण रौ कैयौ है।``
''भगवांन भोळै री मेर.....। भलौ हुवै वां रौ ! कंम सूं कंम आसरौ तौ मिल्यौ....।`` चंदरौ बाई हेठै उतरतां थकां कैयौ।
काळू गाडी रौ बारंणौ खोल दियौ। दसरथ तारा नै अेकलौ ई गोदी मांय चक उण घर कांनी भज पड़्यौ। रूड़ इब जोर पकड़गी अर तारा री चिरळी ई। पीड़ इब उण री कड़तू अर पेडू तांईं बधगी ही। उण रा दोंनूं पग जांणै लकवौ मारग्या हा। चंदरोबाई अर काळू ई दसरथ रै लारै-लारै भाज पड़्या।
दसरथ पैलीपोत रै उण घरां आंगंणै मांय आ पूग्यौ। उण बखत वा बडकी आंगंणै मांय ई ऊभी ही। उण री दोंनूं बीनणियां ई उण रै कंनै ई ऊभी ही। बडकी आपरै घरां पैलां ई सौ-कीं बता दियौ हौ। घर रा धंणी-टाबर आंगंणै मांय ऊभा दांतंण करै हा। दिनुगै-दिनुगै आपंणै घरां अेक नुंवौ पावंणौ बापरसी, इण बात सूं वां रै चेळकौ हौ। सगळां रै चेरै री रूंआड़ी ऊभी हुयरी ही।
दसरथ तारा नै गोदी मांय चक्यां आंगंणै मांय पूग्यौ। उण ई बखत बडकी अर उण री दोंनूं बीनणियां उतावळी-सी साम्ही आयी। वां तारा नै साम्यौ अर मांय लेयगी। चंदरोबाई ई वां रै लारै-लारै मांय बड़गी। जद दसरथ मांय जावंण लाग्यौ तौ बडकी उण नै बारंणै मांय ई थांम लियौ। बोली, ''मांय थारौ कांईं कांम ? टाबर हुवंण बखत मरद मांय कोंनी रैवै। म्हे संभाळ लेस्यां सौ-कीं। थे बारै आंगंणै मांय ई बिराजौ।``
दसरथ रौ मंन पाछौ पड़ग्यौ।
पछै काळू आपरी गाडी बसती रै कंनै लाय ऊभी करदी अर खुद दसरथ कंनै आंगंणै मांय आयग्यौ।
आंगंणै मांय दांतंण करतां-करतां घर रै लोगां दसरथ सूं जांणपिछांण काढंणी सरू करी।
''कठै रा रैवासी हौ ?``
''नंद गांम रा।``
''कांई नांव है आपरौ ?``
''म्हारौ नांव दसरथ अर बाबै रौ बालारांम घोलप है सा।`` दसरथ बतायौ।
दांतंण करणियां तींनूं जंणा बाबौ-बेटा हा। पूछणियौ मांणस वां दोंनुआं रौ बापू हौ। पाकी उमर। सिर रा बाळ धोळा। इरिगेसंन मांय नौकरी ही पैलां। अबैं नौकरी पूरी हुयां पछै घरां ई हा वै। वां आगै कैयौ, ''म्हैं सांतारांम घोलप नै जांणूं।``
''किंयां ?``
''म्हे दोंनूं इरिगेसंन मांय साथै-साथै ई हा।``
''वै तौ म्हारा काकौ सा है।`` दसरथ कैयौ।
''चोखी जांण-पिछांण नीसरी।`` बिचाळै ई काळू बोल्यौ। तद दांतंण करतां थकां बूढै कैयौ, ''चोखी बात है...... सांतारांम अर म्हैं सागड़दी हां। वां नै कैय देेईयौ म्हे सीतारांम जी रै घरां गया हा। पछै डोकरै आपरै दोंनूं छोरां सूं परिचै करायौ। दसरथ वां सूं रांम-रूंमी करी।
''चलौ पुरांणी पिछांण अबैं कांम आयगी.....``काळू बोल्यौ।
''वा बात कोंनी। जे आ पिछांण नीं हुवंती तौ ई म्हे थारी इमदाद करता.... अर आ पिछांण तौ हुयी ई पछै है।``
काळू अर दसरथ दोंनूं हांसंण लाग्या।
डोकरै सीतारांम रा दोंनूं छोरा हाल तांईं दांतंण करै हा। सीतारांम वां सूं कैयौ, ''मांय सूं दौ कुरसी ल्यावौ, पावंणा सूं आपां ऊभा-ऊभा ई बतळाय रैया हां।..... अर मालती सूं दौ चाय रौ कैय देवौ।``
बडोड़ौ छोरौ मांय सूं रबड़वाळी दौ कुरसी ल्यायौ। दसरथ अर काळू कुरसियां माथै बैठग्या।
''पैलीपोत रौ जापौ है नीं ?``
''हम्बै !`` दसरथ हामळ भरी।
''रूड़ कदसी`क सरू हुयगी ही ?``
''बडै झांझरकै ई।``
''सुसरौजी कठै रा है ?`` सीतारांम जी पूछ्यौ।
''राऊनबांडी रा है। वां रौ नांव संभाजी राऊन है।``
''वै होटळवाळा ?``
''हां, वां रौ होटल है। थे जांणौ वां नै ?`` दसरथ पूछ्यौ।
''चोखी तरियां......।``
''किंयां ?``
''भई झ्यांन मांय फिरेड़ौ हूं। हरेक गांमै म्हारी जांण-पिछांण है। जठै ई जावूं आपरी बोली रै बंट लोगां सूं जुड़ जावूं।``
सीतारांम जी घंणी अंजस सूं बात करै हा। थोड़ी ताळ पछै दोनुंवां खातर छोटकी बीनंणी चाय ले आयी। दसरथ मूंडौ धोवंण खातर पांणी मांग्यौ।
मांय सूं हाल ई तारा रै कुरळावंण री आवाज आवै ही। चाय पींवतीं बरियां जोर सूं चिरळी सुणीजी। पछै च्यांचप हुयगी। सैंग ठौड़ अबोलौ फिरग्यौ जांणै। थोड़ी ताळ.... फगत थोड़ी ताळ पछै टाबर री 'उआं....उआं` कांना मांय पड़ी। उण ई बखत बायरौ जोर सूं बैवंण लाग्यौ। दरखत री डाळी अर पानका हालंण लाग्या। बसती मांय चेळकौ बापर आयौ। सीतारांम जी री बडोड़ी बीनंणी भाजंनै बारै आयी अर बोली, ''नानियौ हुयौ है।``
''दसरथ रै चेरै अंजस बापरग्यौ।
''म्हारी गाडी बरदाऊ है जकै सूं थारै पैलीपोत रौ छोरौ हुयौ है।`` काळू छोरै री बडाई खुद लेवंण री कोसिस करी।
''आ बात कोंनी ! म्हारै घरां हमेस इंयां ई हुंवतौ आयौ है। इण घर मांय जपायत रै पैलीपोत रौ छोरौ ई हुवै। म्हारी मां रै सगळा छोरा हुया। म्हारी जोड़ायत रै ई दोंनूं छोरा हुया अर म्हारी बीनणियां रै ई पैलीपोत रा छोरा हुया है। इण खातर म्हैं तौ म्हारी बीनणियां नै जापै सारू पीअर कोंनी जावंण देवूं।`` सीतारांम जी कैयौ।
दसरथ रै नानियौ हुवंण री बडंम दोनुवां बांटली पंण दसरथ सारू कीं छोडां आ किंण रै ई मंन मांय कोंनी आयी।
सुरजी कद रौ ई ऊगाळी हुयग्यौ हौ। उण री झमाल चौगड़दै पसरगी ही। तद तांईं सीतारांम अर वां रा दोंनूं बेटां न्हावा-धोयी करली। सिरावंणौ कर लियौ। भीतर तारा रै संपाड़ै सारू पांणी तातौ हुयर्यौ हौ। उण नै जीमंण खातर ई कीं देईज्यौ हौ। दसरथ पूछ्यौ तौ भीतरियां कैयिज्यौ कै मां-बेटौ दोंनूं सावळ है। चिंत्या री कोई बात कोंनी।
.........अचुम्बै री बात.... तारा बीच गैलै मांय अणचौबड़ घरां टाबर जंाम लियौ......... दसरथ सोचै हौ। वां री घंणी इमदाद हुयगी, इब घंणी ताळ अठै थमंणौ आछौ कोंनी इण खातर वौ सीतारांम जी सूं बोल्यौ ,''चंगा.... अबैं म्हांनै सीख दीरावौ। थारी घंणी ई मेर रैयी, और तफौ सावळ कोंनी.......... पैलां ई घंणी मैरबांनी हुयगी।``
''मैरबांनी री कांईं बात है ? ओड़ी मांय तौ चोर ई इमदाद करै, म्हे तौ मिनख हां।`` सीतारांम जी कैयौ।
उण ई बखत चंदरौ बाई बारै आयी अर बोली, ``दसरथ ! काळू नै गाडी टोरंण रौ कैयदे। अबैं आपां नै पूठौ चालंणौ है। ``
सीतारांम जी बोल्या, ''इत्ती उतावळ कांईं है ? जीमं-जूठंनै जावौ।``
''नीं... नीं सा। थे ब्होत इमदाद करी है। और घंणा फोड़ा कोंनी घालां थांनै।`` दसरथ कैयौ।
''उण नै म्हे फोड़ा कोंनी मांना। थे तौ म्हारा पावंणा हौ। थांनै जीम्यां पछै ई जावंण देस्यां।`` कैयां पछै सीतारांम जी आपरी नाड़ आंगंणै कांनी फोरी अर हेलौ पाड़्यौ, ''मालती, जीमंण री त्यारी करौ दखां, पावंणा जीमंनै ई जासी।``
इब दसरथ कांईं बोलै हौ। वौ अबोलौ रैयग्यौ।
सीतारामजी फेरूं दसरथ कांनी देखतां थकां कैयौ, ''थे तौ मोरवाड़ी रै सफैखांनै जावै हा नीं ?``
''हां सा।``
''तौ गाडी बारै काढौ।``
''किंण सारू ?`` काळू पूछ्यौ।
''मोरवाड़ी मांय म्हारौ थोड़ौ-सौ कांम है..... जीमंण त्यार हुयां सूं पैलां आपां पूठा पूग लेस्यां।``
दसरथ अचुम्बै मांय काळू कांनी देख्यौ। सीतारामजी रै मांयली बात दोनुवां रै समझ कोंनी आयी। काळू अबोलौ ऊभौ हुयग्यौ अर गाडी कांनी चाल पड़्यौ। पछै दसरथ अर सीताराम ई चाल पड़्या।
मोरवाड़ी मांय सीतारामजी अेक गाभां री दुकांन साम्ही गाडी थांमंण रौ कैयौ। काळू गाडी थांमदी। दोनुवां नै गाडी मांय बैठ्या रैवंण रौ कैय सीतारामजी अेकला दुकांन मांय बड़ग्या। कीं ताळ पछै जद पूठा बावड़्या तद वां रै हाथ मांय अेक झोळौ हौ। दसरथ सोच्यो..... बूढै नै आपरी कीं चीज-बस्त लेवंणी ही पंण वंण कीं पूछ्यौ कोंनी।
पछै गाडी अेक सोंनी री दुकांन साम्ही थमवायी। सीतारांम वठै ई कीं लियौ। सगळौ कांम हुयां पछै सीतारांम जी बोल्या, ''चालौ ! इब पूठा चालां।``
काळू गाडी टोरी अर वै पूठा आयग्या।
दस बाजग्या हा। हाल सुरजी ई दौ लाठी चढग्यौ हौ। सीतारामजी रा दोंनूं छोरा आप-आपरै कांम माथै टुरग्या हा। वां री बीनणियां जीमंण त्यार कर लियौ हौ। तारा हाल सावळ ही। बडकी अर चंदरोबाई दोनुवां रळ मां-बेटै नै संपाड़ौ करा दियौ हौ। तारा जीसोरै सूं नानकियै कांनी देखै ही।
बडकी सगळां सारू जीमंण लगायौ। दसरथ रौ भूख सूं काळजौ टूटै हौ। सैंग धापंनै जीम्या। जीम्यां पछै दसरथ बोल्यौ, ''मायतां, अबैं म्हे चालां ! ब्होत मोड़ौ हुयग्यौ।``
''थोड़ी ताळ और थंमौ।`` सीतारामजी कैयौ।
''अबैं कांईं रैयग्यौ........... घंणौ ई कर दियौ थे तौ...।`` दसरथ बोल्यौ।
''दुनियां मांय लोग जावंण सारू ई आवै। म्हे कुंण हुवां हां थांनै थामणिया ? भला पधार्या थे...... म्हारै कांनी सूं कीं अकोर तौ अंगेजौ।`` पछै बूढै सीतारांम मांय झांकतां थकां आपरी जोड़ायत नै हेलौ पाड़्यौ, '' मालती ! म्हैं अबार जकौ झोळौ लेयंनै आयौ हौ वौ अठींनै ल्यायी दखां।``
मालती वौ झोळौ ल्यायी अर सीतारांम जी नै पकड़ा दियौ। उण झोळै मांय तारा खातर अेक साड़ी अर नानियै खातर झुगला-टोपी हा।
दसरथ बोल्यौ, ''मायतां ! औ कांईं कर्यौ थे ?``
''भला मांणसौ.... आ कांईं बात हुयी ! दिनुगै-दिनुगै म्हारै घरां नुंवौ जीव बापर्यौ है, उण री खातर म्हे नीं करस्यां तौ और कुंण ई करसी ? आ सोनै री सांकळी नानियै खातर !`` सोंनी री दुकांन सूं लायोड़ी अेक डब्बी दसरथ नै दिखांवतां थकां सीतारांम जी कैयौ।
औ सौ-कीं देख्यां पछै दसरथ अर चंदरोबाई री आंख्यां मांय पांणी भर आयौ। दसरथ सोच्यौ, कित्तौ-कीं कर्यौ है आं ! बोल्यौ, ''मायतां, थे तारा नै आपरी बेटी मांन ब्होत कीं कर दियौ....।``
''वा म्हारी बेटी ई समझौ... । बेटी आपरै पैलै जापै मांय पीअर आवै। आज म्हारी बेटी पीअर ई आयी है। म्हारै बेटी कोंनी ही। उपरलै री मेर सूं आज म्हंनै बेटी मिलगी। साच्यांणी जे म्हारै बेटी हुंवती तौ उण खातर म्हैं औ सौ-कीं नीं करतौ ! म्हैं जकौ कीं कर्यौ है वौ म्हारी बेटी खातर ई समझौ। .... अर अेक बात और ! इण बूढै री अेक बात मांनल्यौ। म्हारै बेटां रै कोई भांण नीं ही। आज रै पछै चायै रखपून्यू हुवै चायै दीयाळी पछै भाई-दूज..... भांण मांन म्हारै घरां आवंण देईयौ। इत्ती-सी बातड़ी जे मानस्यौ तौ म्हैं जाणस्यूं कै म्हारै दोंनूं बेटां रै अेक भांण है..... अर म्हारै अेक धीवड़।
कैंवतां-कैंवतां सीतारांम जी गळगळा हुयग्या। काळजै रौ हेत आंख्यां मांय ओलर आयौ। चौगड़दै च्यांचप्प हुयगी। कोई कीं कोंनी कैवै हौ। कुंण ई किंण सूं बतळायौ नीं।
औचट दसरथ रै कांईं जी मांय आयी ठाह नीं, झुकंनै सीतारामजी रै पगां लागग्यौ। इंयां करतां उण री आंख्यां मांय पांणी तिर आयौ। थोड़ी ताळ पछै सौ-कीं सावळ हुयग्यौ। रळी-किरंणां चौफेर पसरगी। दसरथ मंन ई मंन सोच्यौ, चलौ आच्छौ हुयौ, अेक नूंवौ नांनौ हुयग्यौ। नूंवौ मांणस नूंवौ रिस्तौ ! म्हे इण रिस्तै नै आखी जिनगी पार घालस्यां।
तारा आपरै नानियै नै गोदी मांय लियां बारै आयी। वंण सीतारामजी री लायोड़ी नूंवी साड़ी पैहर राखी ही। पल्लै सूं सिर नै बांध राख्यौ हौ। बारै आय गोदी मांय टाबर नै सावळ कर वा सीतारामजी रै पगां लागी। सीतारांम जी सीली आंख्यां आसीस दीवी।
''म्हैं आंवती-जांवती रैयस्यूं बाबा.......।`` तारा कैयौ।
डोकरै सीतारांम उण नै आपरी छाती सूं चेप लियौ।
पछै सैंग पूठा चाल पड्या। उण बखत सीतारांम जी रै घर रा सैंग जंणा गाडी कंनै ऊभा हा........धीवड़ नै सीख दीरावंण सारू... !

Saturday, May 8, 2010

बावळी




तावड़ी बावळी
करै उतावळी
सुरजियै रै भकायां बाळै
मरूधरा रौ सिर
अर आभै री पगथळी
हाल ठाह कोनी उण नै
कै वा
कमावै पाप
भोळी झळ रौ साप
डस लेसी जद सगळा नै
तौ हुयसी वा आप ई
गळगळी।

Sunday, April 25, 2010

अेकलपौ

अेकलपौ


आभै सूं पड़ती
ओळ्यूं री अेक छांट सूं
किंया ठंडो हुवै
उकळती रेत सौ
म्हारो अेकलपौ


रूसेड़ी सी धरती
अैरकेड़ौ सौ
आभौ
कदै-कदै चिलकता
डर्योड़ा सा तारा
अर
च्यांचप अंधारौ
सैंग अेकला है
म्हारली दांई


टाबरपंणै री
कोथळी झड़काय
जुवांनी रौ दग्गड़
चक्यां फिरै आजकलै
म्हारौ अेकलपौ


म्हैं जागूं
पंण
होळै सीक
पसवाड़ौ फोर्यां सूत्यौ है
म्हारै भीतर अेकलपौ

Saturday, April 24, 2010

अनोखी बात

अनोखी बात

आऔ अनोखी बात करां
धोळै दिंन री रात करां
बादळ फोड़ां तारां तोड़ां
पळपळांवतौ गात करां
पून टूळावां चांद भुळावां
ऊद कोई घड़ीस्यात करां
ऊदां लमूटां आभौ पटकां
धरती टांगंनै छात करां
पगड़ी खोलां दाढ़ी छोलां
ओजूं मिनख जात करां

आपंणौ रंग

आपंणौ रंग

आऔ टाबरौ आऔ लाडी
आऔ चलावां पगां गाडी
किरतिया लेले रावंणहत्थौ
थूं ई आज्या भादर ढाढी
धोळौ उरंणियौ, गोरौ बाच्छौ
साथै टोरल्यौ काळी पाडी
टीबै री झौ कातीसरौ करां
तेजौ गावां बीजां साढी
ऊकळां जेठ, भीजां सावंण
धंवर री चादर ओढां जाडी
डाकंणियै जोड़ै नाव चलावां
गुच्ची मारां काळती नाडी
रोड कढांवां, टोपी ओढां
पगड़ी बांधां ठाडी ठाडी
सगळा रंग कुंणसै रंग मांय
आऔ आऔ बूझां आडी।

Monday, April 12, 2010

घर




घर

धड़ाधड़ धुड़ै
घर
तौ ई उण नै लागै
नीं हुवंण सूं बेसी हुवै
हुवंण रौ डर।


मुच्योड़ी सी देगची
थाळी
बाटकिया
अर पेडै सारै दौ ठीया
औ ई है
.....उण रौ घर।


आंगंणौ
नीं बारंणौ
लीपंणौ
नीं सुवांरंणौ
अर नां ई
छात पड़ंणै रौ डर।


वा चीड़ी
रोज ल्यावै घोचा
लांबा-ओछा
जचावै
इन्नै-बिन्नै सरकावै
अर वौ
खुद नै समझावै।


काल
उण अेक घर देख्यौ
ढूंढां मांय ढूंढा
अर ढूंढां माथै ई ढूंढा
जठै बारै बैठ्या अेक डोकरौ अर डोकरी
तावड़ी सेकै हा
नां....नां
स्यात कीं उडीकै हा।

Saturday, April 10, 2010

बिरछ अर आदमी

बिरछ अर आदमी


बिरछ
बिरछ हुवै
आदमी, आदमी
बिरछ
बिरछ ई रैवंणौ चावै
पंण आदमी ?
नां आदमी ई रैवंणौ चावै
नां
बिरछ ई हुवंणौ चावै।


कदै-कदै
मिनख रै मरंणै सूं पैलां ई
मर जावै
मिनखपंणौ
पंण बिरछ
मर्यां पछै ई जींवतौ रैवै
कठै न कठै।


थे
किंण ई
मर्योड़ै मिनख नै
बोलतां देख्यौ है ?
कोनी नीं ?
पंण
थे सुंण सकौ
किंण ई ठूंठ हुयोड़ै बिरछ रै
खरखोदरै सूं आंवती
'चूं..चीं , चूं...चूं...`
री आवाज।


लफंणा मांय
चिंचाट करता चिड़िया
इण डाळी सूं उण डाळी तांई
उडती पांख्यां
खरखोदरां मांय उडीकती आंख्यां
अर अठै तांई कै
मुस्कल सूं ठरड़ीज आई
सांसां नै ई
कीं नां कीं देयां पछै
उबरतौ ई रैवै
उण कंनै बिरछपंणौ।


टाबरपंणै मांय
छादी
रोज सुणांवती
घर साम्ही ऊभै नींम रै
हांसंणै
मुळकंणै
सांस लेवंणै
अर बतळावंणै री बातां
पंण हाल
नां दादी है
नां नींम ई।

Wednesday, April 7, 2010

बापू




बापू


थे हा
जद ई
घंणी बरियां
मां ठुसका भरती
सिसकती
हाल थे कोनी
तौ ई
मां री आंख्यां बगै
धारोळा बंण नै
बियां ई।


थांनै गुजर्यां
बखत हुयग्यौ
पंण हाल ई
रोज सिंझ्या
बारंणै मांय लोटौ ढाळतां
उडीक रैवै
'लोटौ ढाळ दियौ कांई बेटा ?`


ओळ्यूं रै मिस
थे आवौ
बोलौ
बतळावौ
सोचूं...
आ सिरधा है
का संस्कार !


म्हैं घूमंण जावूं
रोज भखांवटै ई
चिड़ियां सारू
तगरै मांय पांणी घालूं
गाय रै सींगां बिचाळै खाज करूं
होकौ भरंनै राखूं
हताई मांय
सौ कीं करूं बियां ई
थारली दांई
पंण खंखारौ करंनै
घरां बावड़ूं
तौ
केई ताळ तांई
मां म्हारौ
मूंडौ जोंवती रैवै।

Tuesday, April 6, 2010

गोडा पुरांण

आं दिनां म्हनै आखो दिन माचै माथै ई काटणो पड़ै। स्यात थांनै ठाह नीं हुयसी, म्हारै डावड़ै पग माथै अेक रतकड़ निसरर्यो है। पण फगत पग कैयां थे सावळ नीं समझ्या हुयसी। हम्बै सा ! समझस्यो बी किंयां ? चिटली आंगळी सूं लेय`र अेडी, पंजो, टंटो, पिंडी, नळी, ढकणी, गोडो, गाबची, साथळ अर ठेठ ढुगरै तांई आखो पग ई तो हुवै। पण सा.. इण लाम्बी-चौड़ी लिस्ट मांय अैन बिचाळै चोभ मांय रैंवतै गोडै रो जिकर करणो चावै हो म्हैं।
गोडै माथै गूमड़ो हुयो तो म्हारा गोडा-सा टूटग्या। नीं नीं गोडा तोड़ दिया नीं। ब्होत फरक हुवै 'गोडा टूटग्या` अर 'गोडा तोड़ दिया` मांय। म्हारी तो किण ई साथै दुसमणी नीं है, पछै कुण तोड़ै हो म्हारै गोडा ! हां.. जकी पैलड़ी बात म्हैं थांनै कैयी बा इंयां ई कैय दीवी ही। बिंयां आं दिनां म्हैं कोई खास काम मांय नीं लाग्योड़ो हो जकै रै नीं सर्यां म्हारा गोडा-सा टूटता। ..खैर ओ अेक न्यारो साच है कै गोडै माथै रतकड़ हुय जावणो गोडा टूटण सूं कितणो कमती-बेसी हुवै। उठो तो गोडां माथै हाथ, बैठो तो गोडां माथै हाथ ! चालो तो गोडां रै तांण अर ऊभा हुवो तो गोडां रै पांण। अर इस्यै मांय रतकड़ न्यारो ! आखै दिन गोडो.. गोडो। गोडै सूं अळगो कीं नीं सूझै।
गोडै री बात चाली है तो म्हनै म्हारी भुआ री ओळ्यूं आवै ! भुआ हाल है तो कोनी। राम नै प्यारी हुयां नै बखत हुयग्यो, पण बां री अेक अेक बात आज ई जींवती है जाणै। भुआ जद ई म्हारै घरां आंवती, आखो घर अेक नूंवै चेळकै सूं भर जांवतो। अुणो-कूणो पळपळाट करण लागतो। पळकै बी क्यूं नीं। साळ-ढूंढां रै गारो लीपीजतो। भींतां रै पुस्ती बंधती। गूदड़ गाभा धोयिजता। मिरच-मसालो पिसीजतो। अर इंयां सगळा कामां साथै साथै चालती बास री काकी-ताईयां री हताई ! दिन तो दिन, रात री इग्यारहा बज जांवती। ओजूं दिन उगतां ई बै सागी समचार ! घरां जाणै मेळो-सो लाग्यो रैंवतो। साल खंड रा लटक्योड़ा काम हफ्तै खंड मांय ई सळट जांवता। अर आं सगळा कामां रै अैन बिचाळै हुंवती भुआ। भुआ... फगत भुआ !
बास री लुगाईयां ई भुआ नै चक्यां राखती.... 'बाई अे थारो तो अठै गोडां तांई रो राज है।`
म्हारी चिन्नी-सै दिमाग मांय आ बात कदेई कोनी सुळझी कै लुगाईयां भुआ री बडाई करती हुंवती का आपरो रोजणो रोंवती हुंवती। पछै म्हैं सोचण ढुकतो कै गोडां तांई ओ राज कड़तू तांई क्यूं नीं हुवै ? कड़तू तो आखै डील रो बिचाळो हुवै। पण समझ मांय जद आयी नीं अर आज ई।
बियां गोडो बी पग रै अैन बिचाळै ई हुवै। सक री गुंजास ई कोनी। अर पग रै ई क्यूं ! आपणी बतळावण, संस्कार अर भासा-संस्कीरती री बी तो चोभ हुवै गोडो। कोनी मानो ? चलो नां मानो ! पण म्हैं कूड़ो कोनी कैवूं। किण ई सजोरै मिनख रै डील कानी अेक सांतरी निजर मार`र आपरै मूंडै सूं मतै ई निसर जावै, 'हाड-गोडां रो धणी है भई.... थू..थू !` तो फेर ? अर गोडां मांस ढळणै री बात कांई म्हारी गोडां घड़्योड़ी है ? कोनी नीं ? झूठ-साच री कूंत गोडां सूं ई हुवै। '... नां भई नां, आ तो गोडां घड़्योड़ी है` अर 'गिरधारियो कद रो हरिस्चंदर है... बीं रा तो गोडा ई गोळ है।` अबैं बोलो सा ! म्हैं गळत कैयी ही कांई ? हुवै नीं भासा री डोर सूं संस्कारां री कूंत ? इंयां तो कांई किण ई रो मंूडो पकड़ीजै ! कैवण नै तो थे आ बी कैय सको हो कै खुद री पिलाणै सारू म्हैं गोडा ई दे दिया। भाई जी आ पिलाणै री बात कोनी समझणै री बात है। चलो थे ई बता देवो, संस्कार कठै सूं आवै ? कोई बाप आपरै घरां माची माथै बैठ`र आपरा टाबरां नै संस्कारां रो पाठ पढा सकै है कांई ? बोल्या कोनीं ?.... खैर, अै सगळी बातां तो आपणै काम करण रै ढंगढाळै, बोलण-बतळाणै सूं ई धकै बधै। बोलण-बतळाणै री बात हुवै तो 'बात-कहाणी री बात हुंवणी लाजमी है। लोक री बात ! हां.. हां कीं लारै मुड़`र देखो दखां। चेतै आयसी दादी-नानी रै मंूडै सूं झरती लाखीणी बातां रो रस। आंधी नानी घरां आयोड़ै आपरै दोहितै रो सिर पळूंस्यो। सिर साथै ऊभा दोनूं गोडा ई। अर पूछ्यो, 'तीनूं भाई ई आयग्या कांई ? दे देवो पडूतर ! किण ई रो सिर गोडै बरगो हुवै तो हुवै ई। अर किण ई रा गोडा सिर बरगा तो कुण कांई करै !
थे सोचता हुयसी कै डील तो और घणो ई ठाडो पड़्यो हो, इंयां गोडा-पुरांण रै लारै पड़णै री कांई जुरत ही ? जुरत ही सा ! जुरत घणी ई है। जमानो बदळीज रैयो है। घणी तेजी सूं। जठै कदेई भाखर हुया करता हा बठै आज फैक्टरियां लागरी है। जठै टीब्बा हुया करता हा अर टीटण जाम्या करती ही, बठै सूं नाज रा बोरा भरीजै। आपणो खावणो-पीवणो, ओढणो-पै`रणो अर अठै तांई कै आखो लाजमो-संस्कार अर साहित तकात रा पासा फुर रैया है। जका सैंग सूं लारै हुंवता हा, बै आज आगै आय`र माकड़ी कूट रैया है। सईकां संू जका खुद पींचिजता आया हा... आज मळाई चाट रैया है। नूंवी पूंन चालै अर नूंवां बूंटा रोपीजै। 'स्त्री चेतना` अर 'दलित विमर्श` री डैरूं बाजै अर आं रै लारै ऊभा पळगोड आपरी तूंद माथै हाथ फेर रैया है। इस्यै मांय संस्कार-लाजमै-साहित री कठै पगी लागै ? जाणै सो कीं ओजूं लिखीजसी। पै`लां लिख्योड़ै अेक अेक सबद रा बचिया कढसी। ओ सो कीं सोच`र म्हारो माथो भूंगग्यो। समाज मांय वरग री थापना हुंवती बरियां सूद्र नै सैंग सूं हेटै मानिज्यो हो। जद रै 'सूद्र` नै आज रो 'दलित` बणाय`र टोगी माथै बिठाइजणै री आफळ हुय रैयी है। तो पछै डील मांय सैंग सूं हेटै मानिजणआळो पग कद तांई भूंडीजतो रैयसी। अर बिंयां ई स्यात समाज रै वरगां नै थरपती बरियां डील नै तो चेतै राखिज्यो ई हुयसी। क्यूं कै सिर सूं बामण, हाथ सूं छत्री, पेट सूं बाणियै अर पग सूं सूद्र रो मेळ मानिज्यो हो। आयगी बात बठै ई ! हरमेस पग री जूती मानिजती लुगाई अर पींचिजतो दलित आज दूजां रै मोडां चढ`र टीकली कमेड़ी हुंवण नै त्यार है तो बिच्यारै पग कांई मोरड़ी रै भाटो मार दियो ? अर गोडो ? गोडो तो अैन पग रै बिचाळै ई हुवै। पड़ी`क नीं कीं पल्लै ? ठीक है फेर ! चालू राखूं गोडा-पुरांण ? कांई कैयो... थकग्या ? चलो खैर... अेक कमरसियल बरेक ले लेवां। जाईयो नां कठै ई। बरेक रै पछै ओजूं मिलस्यां।

ओल्यूं रै मिस


म्हारै बारंणै
अर आंगंणै
थूं आवै रोज
पंण म्हनै दीसै फगत
थारा
जांवता खोज।


आखी रात
भीज्यो म्हारौ गात
अर
'टप...टप चोयी छात।


थूं आवै
रोज आवै
अर आपरी चूंच सूं
आडा-टेडा तिणकला जचावै
उडीकूं
कद पूरो हुयसी थारौ आलंणौ
म्हारै भीतर।


म्हारै काळजै मांय
अंधारै रो रूं रूं टूटै
स्यात...
कोई किरंण फूटै।


मेळै जिसी भीड़ मांय ई
म्हनै
आवड़ै कोनी
तद कळमळायनै पूगंणौ चावूं
थारै तांई
पंण
हाथ पूगै कोनी।


'छंण...छंण..छुंण`
संणूं
म्हारै काळजै मांय
थारी पाजेब री
रूंण-झुंण


उकळती दुपारी मांय
म्हारै साथै
तपंणी नीं चावै
तारां छाई रात मांय
रमंणी नीं चावै
तौ बता
किंयां अवेरूं थारा पांवडा
थूं
छिंन-अेक ई
थमंणी नीं चावै।


म्हारै सूं नीं बोलै
अर ओलै-ओलै
हीयौ खोलै
ठुसका भरै
बावळी !
इंयां रूस्यां
कांई सरै ?


हींडतौ देखूं थंनै
ओळ्यूं रै हींडै
तौ
देही रै ठींडै-ठींडै
केई झरंणा फूटै
अर
पोर-पोर सूं
धारोळा छूटै।

१०
ऊमटती आंधी रै लारै
दीसतौ थंनै
मेह
धोबां-धोबां धोंवती
आंख्यां री खेह
देख आज ओजूं ऊमटी है
कळायण,
हुयसी हळाबोळ
बंजड़-झंखड़-बाढ
इंयां रीतौ कोनी जावै
म्हारी आंख्यां रौ असाढ।

११
टीबै री टोगी
चांद नीसरर्यौ है
चौगड़दै च्यानणौ पसरर्यौ है
भाजनै चढूं म्हैं
टोगी माथै
पंण
रेत मांय किंयां तिसळूं
अेकलौ ई।

१२
उडीकूं थंनै
सुपंनां मांय अंवेरूं
थूं उतरै होळै-सी`क
ओळ्यूं रै गातां
परूंसै
मैंदी राच्या हाथां
साची.... उण दिंन
रोटी ब्होत सुवाद हुवै।

१३
ढळती किरत्यां
कोई तेजौ गावै
'टिहू-टिहू` टिटूड़ी
किंण ई नै बुलावै
पूरब मांय भाग पाटती
झिझकै
आभै रै पटपड़ै
पसेवौ चूअ आवै
इस्यै मांय लागै
स्यात... थूं आवै।

१३
सरर-सरर सरकती
रेत रा ठीया
उतरती सिंझ्या रा
कूं-कूं पगलिया
आथूंणी कूंट तांई पसरती
बूढियै नींम री छिंयां
सोचूं... अै सगळा
थारै आवंण रा
अैनांण ई तौ है।

Monday, April 5, 2010

राज.... नीति

राज.... नीति


स्यात थे सोचता हुयसी कै अबार ई राजनीति रा डंड कढसी। बिंयां`स थारो इंयां सोचणो बेजां कोनी, क्यूंकै 'राजनीति` आजकलै कै`नाण दांई बरतीजै। कठैई कीं आछो हुंवतो हुवै तो झट कहिजै, 'थानै ठाह कोनी.... इण मांय कांई राजनीति है...।` अर जे कठैई कीं माड़ो ई हुय जावै तो.... 'आं ई तो बां री राजनीति है।` देख्या मजा ? इन्नै ई म्हे अर बिन्नै ई म्हे।
अेक बखत हो जद राजनीति सूं सीधो सनमन राखणिया ब्होत कमती मिनख हा। इंयां बी कैय सकां हां कै आंगळियां माथै गिणिजणआळा अै लोग राजनीति रै चौगड़दै बाड़ दांईं ऊभा रैंवता हा। ... बापड़ी राजनीति ! आम जनता सारू तो राजनीति चांद हो अेक्यूं रो। जको कदेई उग्यो ई कोनी। रजवाड़ां रो बखत फुर्यो तो राज ई फुरग्यो। राज रै फुरतां ई पासा फुरग्या अर आम जनता रै हाथ आयग्यो बो अेक्यंू रो चांद ..... मतलब झुणझुणियो। इब म्हैं ई लाडो री भुआ अर म्हैं ई ! दे घूत माथै घूत बिच्यारी राजनीति रो डील पाधरो कर न्हाख्यो। इस्यै मांय बणीठणी (?) आपरो डील बचावै का सिणगार ? नीति रो सिणगार छूटग्यो अर राज रा बोरिया खिंडग्या। राज...नीति छेकड़ छेकड़लै मिनख री नियति बणगी। कांई कैयो..गळत कैय दियो ? चलो खैर..
अेक बात तो थे ई मानस्यो कै राज तो जनता रो ई है। जनता सारू अर जनता रो राज। आपणै संविधान मांय ई आ ई बात लिख्योड़ी है। पण कुणसी जनता रो राज कुणसी जनता खातर ? समझ मांय आयी ? आपणा बडेरा आपणै सूं पै`लां जाम्या हा। ऊंच-नीच अर आगै-पाछै रो चेतो हो बां नै। संविधान मांय जनता रो जनता सारू राज लिखती बरियां बां रै दिमाग मांय आ ख्यांत तो लाजमी ई रैयी हुयसी कै अेक जनता बा जकी राज भोगसी अर.... अेक बा जकी राज भुगतसी। हुयसी तो दोनूं ई जनता। कोई समझै तो समझ लेवो अर नीं समझ मांय आवै तो कुचरबो करो सिर। क्यूं है नीं राज री बात ?
ल्यो ओजूं बठै ई पूगग्या। राज हुयसी तो नीति तो हुयसी ई। पण म्हैं थांनै आ बात मांड`र बता देवूं कै न्यारां रा बारणां अेक कोनी हुया करै। जद राज भोगणआळी जनता अर राज भुगतणआळी जनता न्यारी न्यारी हुय सकै तो बां माथै राज सारू नीति अेक किंयां हुय सकै ? मतलब फगत अेक सबद 'राजनीति` सूं किंयां नाको लाग सकै ! लागै ई कोनी अर लागणो बी नीं चाइजै। राज भोगणआळी जनता सारू राजनीति अर राज भुगतणआळी जनता सारू राजनियति...। अबार तो सावळ है ?
कैवण नै तो थे कैय सको हो कै इंयां कांई ठाह लागसी कै कुण राज भोगणआळो है अर कुणसो राज भुगतणआळो ? गतागम मांय अळूझण री जुरत कोनी। हरेक गांठ रो आंटो हुया करै। फेफां बाई राम राम ! किंयां पिछाण्यो ? ...डौळ देख`र। राज भुगतणआळी जनता रो डौळ कांई छांनो रैवै ? खुद रै राज मांय जकी जनता रै मूंडै माथै अेकर चेळको बापरै, समझल्यो राज भुगतणआळी जनता है अर जकां रा मूंडा हरमेस पळपळाट करता रैवै... राज भोगणिया।
बियां पिछाण रा अै झीणा आंटा स्यात थारै कीं कमती पल्लै पड़ता दीसै। कोई बात नीं सा... म्हैं कांई बारै रो हूं ? हूं तो थारै मांयलो ई। किण ई दूजी ढाळ सोध लेस्यां।
अेक रेवड़ मांय पांच सौ रै नेड़ै-तेड़ै भेड-बकरियां है। जे भेड बकरियां सूं चौगुणी हुवै तो न्यारी न्यारी गिणणै सारू थे कांई करस्यो ? कांई कैयो बकरी गिण`र पांच सौ मांय सूं घटा लेस्यो ? स्याबास... ! आ ई बात म्हैं कैवणो चावै हो कै इण भेड-बकरियां रै ठाडै टोळ मांय बकरी कमती है, तो बां नै ई गिणणी चाइजै। राज भोगण-भुगतणियां रै इण टोळ मांय राज भोगणियां नै सावळ तरियां चांक्या जाय सकै।
नूंवी ढाळ ई सई ! थे किण ई धोबी कनै जाय`र पूछ सको हो कै भाया कड़प लगा`र धोवण सारू कितणा चोळा-पजामा आयोड़ा है (बियां धोती सारू बी पूछ सको हो पण कांई है कै धोतीआळा कमती ई रैया है) ? का फेर टेलिफून मै`कमै मांय जाय`र ठाह लाग सकै कै मोटोड़ा बिल कितणा`क बकाया चालै ? बिंयां पूछण नै तो ओ ई पूछ्यो जा सकै कै किण किण रै घरां खेतर रा सगळा अखबार पूगै !
थे कैवो तो अेक लुकवां बात बतावूं सा ! हरेक थिति पूरमपट हुवण सूं पै`लां अेक 'प्रोसेस` मांय चालै। राज भोगणआळी जनता बी कोई अचाणचक ई त्यार कोनी हुवै। अेक लाम्बी अर आंटपटीली 'प्रोसेसिंग` चालतां थकां त्यार हुवै आ पौध। इस्कूल मांय क्लास री मानिटरी सूं बी सरू हुय सकै आ जातरा अर चमची सूं कुड़छो बणणै री 'प्रोसेसिंग` बी इण री चोभ हुय सकै। आंटा और ई घणा सारा है। कदे कदे 'आरक्षण` री सी`ल सूं बी नाको लाग सकै। मेह चायै ऊपरियां पटकीजै चायै धरती हेटै सूं चूवै.... मतलब तो कादै सूं है नीं ?

Thursday, April 1, 2010

विकास बनाम न्यारपणो

विकास बनाम न्यारपणो


दिन दसेक पै`लां म्हे न्यारा हुया अर अेक घर रा तीन घर हुयग्या। जबरी हुयी बटी ! पण घरआळी रो चेळको देख्यां ई जावो थे ! टाबर.....? अेक तो साल पांचेक रो.... बिच्यारै नै ठाह ई कोनी कै हुयो कांई है। दूजी छोरी है, बरस तेरहा चौदहा री। जकी नूंवै आंगणै घाट अर दादीआळै आंगणै बेसी ! लारै बच्यो म्हैं.... लाई ! लोगां रै सुवालां रो उथळो देंवतो देंवतो बेदमाल हुयग्यो। और तो और बो ई जकै सूं कदेई राम रूमी ई कोनी रैयोड़ी, खट पूछ लेवै... 'किंयां न्यारपणो जचा लियो कांई ?` अर लुगाईयां ? ओ..हो...हो, छोड देवो गल्ल ! कुम्हारां रो बास, चंडीगढ मोहल्लो, भूतियां रो टीब्बो.... घणी कांई बतावंू आखै गाम मांय आग लागगी जाणै। मिलै जको ई अेकर पूछ्यां बिना कोनी रैवै। केई तो जाणै आपरी पीड दाबता सा लागै...'निहाल हुयग्यो रैय !` अर लुगाईयां... 'आछो कर्यो देवरा ! म्हारी द्योराणी नै ई कीं सुख हुय जासी !` अबैं बां नै कोई पूछणियो हुवै कै थूं कितणी`क पांगरगी ? पै`लां तो कीं गोतो ई मार लेंवती ही। 'आज तो सिर दुखै, म्हारै सूं खेत कोनी जाइजै।` का फेर 'आज तो म्हारो बरत है.... आज तो सिर धो`स्यूं। सुकरवार है।` कैय दियो तो कैय दियो। कुण पालै ? इण नै ई तो कैवै सीर ! जठै आला-सूका सैंग बळै। कोई न्हावो तो कोई खावो। कठै कुण कांई करै, घणी गिनरत नीं। पण न्यारो तो न्यारो ई हुवै। गाम-गामितरै जावणो तो सेको। घरां सोयसी कुण ! खेत गयोड़ा हुवै तो घरां आयोड़ो बटाऊ सिर मारतो फिरो भलां ई। चाय रो कोपड़ो कोई पाड़ौसी झला देवै तो सावळ नींतर उडीकबो करो। बिंयां`स चाय मायं डोको तो न्यारा हुयोड़ा घरां मांय कोनी ऊभौ हुय सकै। बूढिया तो बिच्यारा हांस्यां बिना कोनी रैवै, 'आ रै खीर रा घसाक `। बां रो खोट ई कांई है। हरमेस ओ ई मानीजतो आयो है कै न्यारो हुंवणियै रै मन मांय लाडू फूटता रैवै कै अबार तो जी करसी जद ई खीर बणा`र खायस्यां। अरै बावळा ! खीर छोड`र चाय ई ढंगसर मिल जावै तो ई चोखी।
बिंयां`स आ कोनी कै न्यारा हुंवणिया धीणौ कोनी राखै। कुणसै नै ई टोक लेवो भलां ई, ' धीणौ क्यांरो है ?` पडूतर हुयसी, 'भैंस रो !` पण जे बांं नै पूछिजै कै खावो हो कांई ? तो पडूतर कोनी लाधसी। अलबत तो डेयरी मांय देयां पछै दूध बचै ई कोनी अर जे कोई घणो ई सुंवाजी अर जाचो हुवै तो बिलोवा-बिलोवी ई कर सकै। पण बिलोवणै रै चक्कर मांय सिंझ्या जको दूध टाबरां नै घालिजै, उण रै कानी कोनी देखिजै। लाल... बम्म ! लीली छिंयां रळ्योड़ो ! पळियो खंड ठरकायो अर वा ! दिनुगै किसी दही हुवै। ढंगसर री लासी रो ई तोड़ो ! लासी मांय बाल्टी भर`र पाणी नीं सरकावै तो पाड़ौसी निराज हुय जावै....'आं रै ई धीणौ देख्यो `! अबैं सगळो बास लासी लेवण नै आवै तो बिच्यारा टाबरां नै दही कठै ? अर चोपड़ ? बो कठै हो ? ' थनै आज चोपड़्यो है पप्पूड़ा... थनै विकासिया आगलै अदीतवार नै तपास्यूं जद... अर..अर !` कांई बतावूं सा ! बाकियां रो नम्बर आंवतां आंवता जे दिन फळांणां पड़ै तो कांई इचरज।
खैर... म्हैं म्हारली बात बतावै हो थांनै। काल रात री ई बात है। दसेक बज्या हुयसी। म्हैं नींद रै बारणै बड़ै-निसरै हो।
'नींद आयगी कांई ?` जोड़ायत ही।
'आं...।` म्हैं नींद रै दुराजै सूं बारै ई ऊभौ हुयग्यो।
'आपणै न्यारो बारणो तो काढल्यो।`
ल्यो करल्यो बात ! न्यारा हुयग्या इण मांय ई कोई सक रैयग्यो ना ? आपरी पोवो अर आपरी खावो। बारणै सूं कांई हंकरावै ही ! पण लुगाई पीदै कुण ?
'घर सीर अर बटोड़ा न्यारा... धिकै कांई ? न्यारा घरां रा तो न्यारा ई बारणा हुवै। `
झूठ हुवै भलां ई पण जोर सूं बोलिजै तो साच सूं बत्तो असर करै। सेवट म्हे आज आपरो न्यारो बारणो काढ ई लियो। इब थारै सूं कांई लुकोवणो है। दिनुगै सूं जी ब्होत उदास है ... भांत भांत री घड़ामंडी चालै अर मांय घिरळमिरळ सी हुय रैयी है। कांई हुयसी ? किंयां हुयसी ? घरां अमूझणी सी आवै। अर बारै ? बारै संको।
दिनुगै दिनुगै ई हरलाल ताऊ आयग्या। फौजी मिनख। हांसै जद खुल`र हांसै। म्हारै साथै तो आछी पटै। आंवतां ई कारो मचा दियो, 'अरै भई ! न्यारो हुयो जको तो आछो... पण कोई न्यांगळ-न्यूंगळ ? सीरो ना सई लापसी ई बणा लेवो।`
घरआळी चाय बणा`र ले आयी। म्हे बैठग्या। म्हैं ताऊ नै भीतरली बात बतादी। ताऊ ठठा`र हांस्या। ' बावळो हुयग्यो रैय मास्टर ! टाबरां नै पढावै न्यारो है। अरै बावळा, न्यारो हुंवणो कांई गाळ है ? थूं तो विकास री बातां कर्या करै। न्यारो हुंवणो तो विकास रो पांवडो है। समाज रो विकास ! समाज बणै परवारां सूं। जठै मिनख फगत जामै ई कोनी, मिनख नै घड़िजै बी है। हम्बै.... साची कैवूं ! ठाडा परवारां मांय हरेक जणै माथै पूरी ख्यांत कोनी करीजै। कुण टाबर पढाई मांय हुंस्यार है, किण मांय किस्यो`क लक्खण है, इण री कूंत रळगडै मांय कोनी हुय सकै। अर ना ई बिस्या मौका ई देयिजै, जिस्या टाबर नै दरकार हुवै।` कीं थम`र ताऊ ओजूं कैवण लाग्या, 'मानां कै अेकल परवारां रा आपरा खोट हुवै है पण आज भाजम भाज रो बखत है जठै दिमाग रा पीसा बंटै। बावळा आपणै परवारां मांय ठाह नीं कितणां विग्यानिक जाम्या बैठ्या है। जे बां माथै सावळ ध्यान देयिजै तो आपां कांई औरां सूं लारै रैयस्यां ? अर आ ई क्यूं ! जद समाज रै विकास री बात करां तो थूं ई बता कै जद मिनख जंगळी हो अर अेक टोळ मांय भेळो रैवणो सरू कर्यो हो तो बठै सूं धकै बधण मांय ओ न्यारपणो काम कोनी आयो ? जे ओ न्यारपणो नीं हुंवतो तो आपणै कनै अळगा-अळगा लाजमा किंयां हुंवता। सिंधु अर नील रै लाजमै री बात तो छोड पण आज रै भारत री कूंत करणै सारू पिच्छम रै लाजमै रो नांव कठै हुंवतो ? ओ तो जुगां जुगां सूं ई चालतो आवै है गूंगा ! इण मांय जी दोरौ करण री कांई बात है ? लोग जे न्यारा ई नीं हुंवता तो गाम बारैकर बाड़ ई हुंवती नीं। इंयां घरां घरां भींत ऊभी करणै री कांई जुरत ही ! पण जुरत ही अर जुरत है। लगोलग है। क्यूंकै आपां नै आगै बधणो है, आगै चालणो है। पूठो नीं जावणो। आगै रो नांव ई विकास है.... अर विकास रो नांव है न्यारो हुंवणो।`
म्हैं बाको पाड़्यां हरलाल ताऊ रै मूंडै कानी देखै हो। ताऊ अेकर म्हारै चेरै कानी ख्यांत्यो अर भळै बोल्या, 'जिंयां जिंयां मिनख बधै, बिंयां बिंयां सेका ई बधता जावै। पछै दो ई आंटा साम्ही रैवै... का तो न्यारा हुवो अर का पछै घरां बधतै जण मांय कट-बढ`र मर जावो। थूं कांई मानै ? न्यारो हुंवणो चाइजै का कट-बढ`र मर जावणो ?`
म्हारै मूंडै सूं उतावळी सी निसरग्यो, ' न्यारो !`
ताऊ तो गया परा पण ताऊआळी बात हाल ई म्हारै जची कोनी। थारै जचगी कांई ?

सीर

सीर


बखत फुरै तो मिनख री सोच ई फुरै। अर सोच फुर्यां सो कीं फुरै। छेकड़ समाज री बुणगट है तो मिनख रै तांण ई। पण कदे- कदे ओ बदळाव कीं कीं अजोगतो-सो हुय जावै। अेक बखत हो जद समाज री मूळ धुरी, जको परवार नै मानिजै, सीर रो खास महत्त हो। अेक अेक परवार मांय सौ सूं ई बत्ता लोग अेक साथै रैंवता हा, पण मजाक है ओ अेकठपणो खिंड जावै ! हां... आ हुय सकै है कै इण अेकठपणै का सीर नै बचाणै रै चक्कर मांय परवार री आगळ आगै लारै सरकीजती रैंवती। पण फेर ई सीर जींवतो रैंवतो। असल मांय कांई है कै उण बखत लोगां रो ओ सीर फगत बारै रो सीर ई नीं हो, सीर रो ओ भाव बां रै भीतर ई जींवतो-जागतो रैंवतो हो। पण आज तीन तीन च्यार च्यार पीढीयां रै लोगां रै अेक चौभींतै रै भीतर अेक गाम दांई रैवण री सोचतां ई धड़धड़ी सी आवै। जद कै उण बखत लोग रैय लेंवता हा....अर रैंवता ई कांई ठाठ सूं रैंवता हा सा ! कदेई कोई राड़ कोनी। कठैई कोई बाड़ कोनी। इब तो सा.. बखत कांई फुर्यो पासा ई फुरग्या। सीर री दुसमी भींत घरां बिचाळै कांई लोगां रै मनां बिचाळै हुयगी। जकां रै भीतर-बारै सीर हुंवतो हो अबार बां रै भीतर-बारै सीर री जिग्यां भींत हुवै। जका कदेई सीर नै महतावू मानता हा अबार भींत नै खास मानै।
आ सगळी गांगरत तो ही घर री। सीर फगत घर मांय ई नीं खेती-पाती मांय बी हुंवतो हो अर काम-धंधै मांय ई। पण कांई है कै घर-सीर अर बारै रै सीर री तासीर मांय रात दिन रो फरक हुवै। स्यात इण खातर ई जठै आज इण नूंवै जमानै मांय घर सीर रा सुपनां ई नीं आवै बठै ई बारलै सीर री आंगळियां घी मांय है। हां इतणो लाजमी है कै घर बारलै इण सीर रो नूंवो नांव 'गठबंधन` हुयग्यो है। जूनै बखत रो ओ सीर मरतो-पड़तो छेकड़ आपरी ठौड़ ऊभौ तो रैय ई गयो। नांव रो कांई बखत फुर्यां तो सो कीं फुर जावै ! पण घर बारलै इण सीर मतलब गठबंधन रो टिकाव सीर करणियां री परकीरती अर सुभाव माथै टिक्योड़ो हुवै। नींतर उतावळी ई घर सीर अर बटोड़ा न्यारा हुंवता हुंवता छेकड़ खाता पाटतां जेज कोनी लागै।
बारलै सीर मांय खास बात आ हुवै है कै सीरवाळी जे अेकसा हुवै तो ई फोड़ो अर जे भोळा स्याणां हुवै तो जाबक ई सेको। क्यूंकै दोनूं सीरवाळी जे भोळा हुवै तो ई सीर धिक जावै लाजमी कोनी। घोचांआळा ई तो आप री बांण भुगतावै है। कोई सावळ दिन तोड़ लेवै, आ कद सुहावै आं नै। अर भोळा तो भोळा ई हुवै। ऊंदी खांनै बैठगी तो बैठगी। पछै सीर रो कांई माजणो ! सीरवाळियां मांय जे अेक जणो भोळो अर दूजो चंट हुवै तो ई नाको लाग जावै पकायी कोनी। चंट सीरवाळी नै भोळो थ्या जावै तो और कांई चाइजै ? इस्यै मांय सीर हुंवतो रैवो भलां ई लीरमलीर ! अर दोनूं पासै रा सीरवाळी ई जे चंट हुवै तो सीर चालण रो खानो ई कोनी। पत्थर सूं पत्थर भिड़ै जद तो आग ई पाटै। दो सीरवाळी अर दोनूं ई अेक दूजै री आंख्यां संू काजळ काढण री कोसिस मांय लाग्या रैवै तो सीर नै कठै जिग्यां ?
पण फेर ई सा ! आ दुनिया है। अर दुनिया मांय सो कीं हुय सकै। आंट अड़ै पण आंटा ई काढिजै। सीर री गुळजट पार नीं पड़ी तो लोगां नांव फोर न्हाख्यो। सीर इब गठबंधन हुंवतां ई परवार अर गाम नै छेक`र देस अर आखी दुनियां तांई पसरण री कोसिस मांय है। आजकलै कुणसी ई तारीख रो अखबार चक`र देख लेवो भलां ई। फलाणी टूथपेस्ट री कंपनी फलाणी कंपनी नै आपरा से`र बेच`र बीं मांय रळगी। फलाणी मोबाइल कंपनी धिकड़ी मोबाइल कंपनी साथै रळ`र आपरो नूंवो नांव धर लियो।
घर बारलै सीर मतलब गठबंधन रो ओ पसराव कंपनियां अर बौपार आद मांय ई हुयो हुवै, आ बात कोनी ! आजकलै तो राज ई गठबंधन रो है। इण राज्य री सरकार गठबंधन री। उण राज्य री सरकार गठबंधन री। और तो और सेंटर री सरकार ई गठबंधन री ! जाणै आ पुखता हुयगी कै जे सरकार बणसी तो गठबंधन री मतलब सीर री ई बणसी नींतर बणै ई कोनी।
कितणै इचरज री बात है कै जकै मिनख सईकां री पिछांण सीर-संस्कीरती नै हळवां हळवां बिसार दीवी ही, गमा न्हाखी ही उण नै ई अचाणचक इब इंयां छाती रै चेपली ? मिनख ई कितणो खेलो करै ! अेक बखत हो जद घर-परवार सीर मांय हुंवता पण राज-सरकार अेकल अर न्यारी-निरवाळी। खुदमुख्त्यार। आज जद सरकार सीर (गठबंधन) री हुवै पण घर परवार अेकला-न्यारा अर मां मर्योड़ी गधियै-सा। जद मिनख रै संस्कार मांय सीर रळ्योड़ो हो तद सरकार रळ्योड़ी कोनी हुंवती। इब जद सरकार रळगड हुवै तो घरां सीर कोनी। करै तो कोई कांई करै ? बूढो-ठेरो कोई कैय बैठै का सीर-सांझै रो जिकर ई कर बैठै तो लेणै रा देणां पड़ज्यै। 'मायतां...सीर री तो होळी हुया करै...... जकी नै फूंक्यां ई सरै।` कर लेवो बात ! बिच्यारो बूढियो टुकर-टुकर भलां ई देखबो करो। जीभ ताळवै रै चिप जावै।

Friday, March 26, 2010

कुचरणी


गठबन्धन री सरकार

पांगळै नै
साथै राखण रौ अळेपौ
जे नीं राखै
तौ ई स्यापौ।


मिनखपणौ

झूठ री नाव माथै
स्वार
मिनख जद
साच सूं परै टिप जावै
तौ मिनखपणौ
कांई लारै रैय जावै।


सत्तापख

पीयेड़ा
कांई कूंतंनै बोलै ?
घणकरा`क तौ
नाळियौ
मूतंनै खोलै।


डतरीउतार

खावै अर सोवै
सैंग सूं बेसी
पंण कांम मांय
लारै रैसी।


गरीब री मनवार

माचली रौ टूट्योड़ौ
बांण
बिठावै पंण
सवै कोनी
खींचातांण।






सीरवाळी

बूढै री
ब्यावली
ठाह नीं
कद तांईं रैयसी
कद भाज जावैली।



कविता
ज्यूं जपायत रै
पीड़ उठै
अर जाम्यां ई
पैंडौ छूटै।



कवि
जकै रै घरां
बटाऊ आंवता डरै
चाय-पाणी पछै
पैलां कविता करै।



सम्पादक
ठाडै रौ डोकौ
पाड़ै
डांग नै जकौ।

Wednesday, March 24, 2010

खाज अर राज

खाज अर राज


खाज खाज ई हुवै अर राज राज ! पण फेर ई दोनूंवां री परकीरती, ढंगढाळै अर रीत-नीत मांय इतणो मेळ है कै लागै स्यात आं री चोभ मांय किण ई भांत री दुभांत कोनी। अेक ई पाणी सूं सींचिजै दोनूं।
मानां कै राज मांय किण ई हद तांई गुमेज बापर आवै पण इण सूं अळगो ओ बी अेक साच है कै राज मांय जको मजो हुवै उण नै किण ई सबदां री सींव मांय कोनी बांध्यो जा सकै। गूंगै रो गुड़ हुवै ओ मजो ! अैन खाज रै मजै दांई ! खाज मांय मिनख जिंयां जिंयां आपरै डील नै कुचरतो जावै ओ मजो और ई बधतो जावै। खुरड़तां-खुरड़तां चामड़ खुरड़ीजै भलां ई पण खाज रो मजो खतम कोनी हुवै। केई-केई तो लाई हाथां नुंवां सूं ई कोनी सारै, छुरियो का दांती सूं बी लाग जावै।
बियां आ तो थे पकायत ई मानता हुयसी कै जे किण चीज मांय खास रस का मजो नीं हुवै तो बा घणै बखत तांई चायिजती कोनी रैय सकै। मिनख रो ओ सुभाव हुवै है कै बो किण ई अेक थिति, किण ई अेक मिनख का किण ई अेक चीज सूं उतावळी ई थक-अक जावै। हां.. जे लोक-लिहाज सूं का ठड्डो कर`र कीं धिकावणो ई चावै, तो ई दो-च्यार पांवडा धकै बध`र पग फ्या देवै। पण खाज अर राज सारू आ बात लागू कोनी हुवै। राज रो चस्को अेकर लाग्यो अर लाग्यो। पछै पाछ कोनी देवै। बियां तो आपणै अठै साठ साल री उमर पछै सरकार नौकरी सूं रिटायर ई कर देवै पण राज मांय रैवण री कोई उमर तै कोनी। 'साठी बुध न्हाठी` हुवै तो हुवो भलां ई। नाड़ हालण लागै तो लागो भलां ई। सूझणो-बूझणो नीं हुवै तो नीं सई। राज कोनी छोडिजै। हुंवण नै तो इण देस मांय 'लोक तन्त्र` है। लोक रो तंत्र है तो लोक नै बांधण रा आंटा ई घणा है। 'आरक्षण` री लाव सूं तकड़ी जेवड़ी और कांई हुय सकै ही! अर इंयां सगळां सारू राज रो मजो 'संवैधानिक` हक हुयग्यो। पण हक हुयां सूं कांई हुवै ! मजा तो लेवणिया ई लेयसी। जका अेकर राज रै चौभींतै मांय बड़ग्या, पूठा जावण रो बै तो नांव लेवै आथ नीं। लागू करता रैवै आरक्षण मोकळो। थांनै-म्हनै कांई ठाह ! ओ ई तो बां रो आंटो है। सांप ई मर जावै अर लाठी ई नीं टूटै। कांई हुयो जे आरक्षण रै तांण किण ई दूजै नै राज रै इण चौभींतै मांय बाड़ लियो। असल मांय बां रै मगरां माथै हाथ तो आं रो ई है। नींतर बां नै कांई ठाह राज किण नै कैवै। बांदर रै हाथ मांय दे देवो नारेळ ! दड़ी बणाय`र रूड़ांवतो भलां ई रैवै। मजाक है फोड़`र खा लेवै ! बीं लाई नै कांई ठाह फोड़`र खावण रो मजो ? नारेळ तो फोड़णिया ई फोड़सी। मजा तो लेवणिया ई लेयसी। राज तो करणिया ई करसी। राज रो कांई ! राज तो बेटा, पोता, रिस्तेदारां अर अठै तांई कै आपरै कारू-कुरबां तकात रै मिस ई हुय जावै। पण राज हुवै आं रै कनै ई है।
कांई कैयो... सरम ? सरम किण री सा ! अर संको किण बात रो ? आ बात तो थे-म्हे ई सोच सकां हां जकां नै नां तो राज रै मजै रो ठाह अर नां खाज रै ! खाज करतां करतां तो मिनख इतणो मगन हुय जावै है जाणै आखी धरती माथै बीं सूं दूजो और कोई नीं है। गळी बगतां, दफतर मांय काम करतां, रिस्तेदारी मांय, घर मांय, आंगणै-बारणै मांय, छोरी छापरी अर टाबरां तकात रै साम्ही ई खाज करतो मिनख इस्यो रम जावै है कै हाथां-पगां री तो छोडो, कदे कदे तो नीं बतावणजोग जिग्यां ई कुचरण लागै तो कुचरतो ई जावै। कुचरतो कुचरतो जाणै किण ई दूजै लोक मांय जा पूगै। साम्ही कुण बैठ्यो है कुण नीं, दर ई होस नीं रैवै।
असल मांय खाज रो मजो ई इस्यो हुवै, इण मांय बिच्यारै मिनख रो कांई खोट ! खोट है कुदरत रो। जकी किण किण ई चीज नै इतणी रसाळ बणा देवै है कै छोडण रो जी ई कोनी करै। खाज करतो-खुरड़तो मिनख भलां ई लोही-झार हुय जावै। राज करतो-भोगतो मिनख, भैंस रा गाय तळै अर गाय रा भैंस तळै करतां, धोळां नै काळा करतां अर काळां नै धोळा करतां-करांवतां छेकड़ धोळां मांय धूड़ गेर लेवै पण राज अर खाज रो मजो.....? ओ हो...हो....छोड देवो थे बात ! इस्यै मांय किंयां छुटै राज अर किंयां छुटै खाज ! आपां तो आ ई कैय सकां कै अै दोनूं भागी रै ई हाथ आवै।

अथ हांडी कथा

अथ हांडी कथा


पेट री आग सैंग सूं भूंडी हुवै। आंगळियां माथै गिणिजणजोग देसां नै टाळ देवां तो सैंग रा सैंग देस इण आग सूं लड़ै ! आपणी तो संस्कीरती ई इण ढाळै री ही। धरती निपजती उण साल सगळो नाज कोठ्यारां मांय जा लुकतो अर इंयां काळ-दुकाळ सोरा टिप जांवता। हाल बखत कीं बदळग्यो पण संस्कार कांई सोरा-सा बदळिजै ? आज ई पढेसरी टाबर नौकरी लागै का दूजै किण ई हीलै, बूढियां रै मंूडै सूं मतै ई निसर जावै, 'चलो रैय...हांडीआळो बार तो मूंदिज्यो...!
हांडी मिनख री 'प्राथमिक` जुरत हुवै। हांडीआळो बार मूंदिज्यो अर मिनख धूंसिज्यो। जिंयां किरकेट मांय 'बैट्समैन` सौ रै आंकड़ै नै पार करतां ई धू..आ..धू लाग जावै।
हांडी रा केई रूप हुवै। अळगी अळगी जिग्यां उण रा नांव ई अळगा अळगा हुवै पण मूल बो ई रैवै। ...गोळ पींदो...चौड़ा कानां। कानां माथै चेतै आयी.... अेक कैवत है नीं, हांडी रीसाणी हुय`र आपरा काना ई तो बाळसी। ब्होत अजीब बात है सा ! हांडी उकळ`र आपरा काना ई बाळ सकै.... और कीं नीं कर सकै ? मतलब कै सैंग सूं कमजोर हुवै हांडी ? चलो सा... कमजोर ई समझल्यो ! क्यूंकै पैली बात तो हांडी माटी री हुवै अर दूजी बा हुवै ई गरीब री है। गरीब मतलब छेकड़लो मिनख। छेकड़लो मतलब जमीन सूं जुड़ेड़ो। अबैं... सोचो थे। जमीन री तलास करता करता तो चोखा चोखा अर खांमखां ई आपरी जूण होम करग्या। फलाणो परधानमंतरी ? अरै सा ! बै तो जमीन सूं जुड़ेड़ा मिनख है। फलाणो साहितकार ? बां रो तो कैवणो ई कांई.... इण री जमीन रा जाया-जलम्या है। बां री भासा जमीन सूं उठ्योड़ी है... लोक सूं उठ्योड़ी। अेक अेक सबद सूं माटी री सौरम आवै जाणै। अर अै ? अै फलाणाराम जी है। कनाडा मांय ठाडो बौपार है आं रो। हाल तीजी पीढी चालै पण अजै तांई सालोसाल आंवता रैवै अठै। ब्होत हेत है आंनै अठै री माटी सूं... आपरी माटी सूं।
अबैं बोलो थे ! आ बा ई माटी है जकी सूं हांडी बणै। अबार ई कैय सको थे... कै हांडी कमजोर हुवै ?
खैर... कीं और पड़ताळ करां। हांडी रा केई रूप हुवै। न्यारा न्यारा रूप अर न्यारी न्यारी बरत्यूं। हांडी रै रूप मांय पाणी तो घलै ई घलै... दळियो-खीचड़ी बी रांधीजै। बिंयां कदे कदे पकवानां (गरीबां रा ई) रो ई नम्बर पड़ जावै। लापसी बणै तो हांडी मांय, ढोकळा बणै तो हांडी मांय अर... । खैर.. आगै सरकां ! दूजो रूप है कढावणी रो। दूध उकाळण सारू। दूध बिलोवणै सारू हांडी बिलोवणो हुय जावै। कीं और ठाडी हुय`र बा माट हुय जावै तो छोटी हुंवती हुंवती कुलड़ियो। कुल मिलाय`र बात आ है कै इण कूणै सूं उण कूंणै तांई हांडी ई हांडी दीसै। आखै घर मांय हांडी सूं अळगो कीं नीं हुवै जाणै। .....थारै जची कोनी स्यात ! खैर जाणद्यो, अेक बात बताओ ! मिंदर मांय चोभ री जिग्यां कुणसी हुवै सा ? गरभघर ई नीं...जठै देवळी थरपीजै ? तो मिंदर मांय सैंग सूं अबोट जिग्यां हुयी गरभघर ! अर घर मांय ? थे कैयस्यो रसोई। अर रसोई मांय सगळो काम-धाम हुवै हांडी रो। अबैं बताओ हांडी सूं बेसी कीमती और कांई हुय सकै..।
हां, आजकलै जमानो कीं फुरग्यो लागै। गरीब रै घरां बी माटी री जिग्यां 'स्टील` लेली। हांडी रसोई सूं अलोप हुय`र माची हेटै का बाड़ै मांय गोबर थापणआळी ठौड़ जा बैठी। कांई कर सकां सा ! आजकलै हरेक चीज उतावळी ई 'आऊट डेटेड` हुय जावै। गाभां री दुकान मांय जावां तो हजारूं डिजाइन रो गाभो हुवै भलां ई पण महीनो ई कोनी निसरै कै सैंग रो सैंग 'आऊटडेटेड` ! फलाणो फैसन 'आऊटडेटेड`। फलाणो खिलाड़ी आऊटडेटेड... फलाणी चीज आऊट...। बिच्यारी हांडी रो तो डौळ ई कांई ! अर फेर कद रोपण लागी ही पग... कांई आज री बात है ? दुनियां मांय सैंग सूं जूनी सभ्यता है सिंधु सभ्यता। सिंधु सभ्यता पूरी री पूरी माटी री सभ्यता ही। बठै काळीबंगा मांय जाय`र देखो दखां ! हांडी कांई इतणी ठाडी हुया करै ? आखै गाम नै जीमा देवो भलां ई।
लारलै पांच हजार साल सूं चालतो आवै हो हांडी रो ओ राज। आज तांई इण सूं बेसी लाम्बो राज किण रो ई नीं हुयो। पण इब ? इब तो जाणै सगळां नाक ई रगड़ लीवी। माटी री हांडी ? छी...छी...। 'बैकवर्ड` हो कांई ? वाह सा वाह ! हांडी बपरायां सूं बैकवर्ड हुयीजै। कुण कैवै आ बात... बै ई भण्या गुण्या नीं जका सिंधु सभ्यता री बात करता थकां गुमेज करै अर ...अर हांडी री बात करतां सरम आवै... बैकवर्ड मानीजै ?
इब कुण बतावै बां नै। अरै भला माणसो ! जे थांनै हांडी सूं इतणी ई चिब है तो हांडी री जिग्यां देगचो क्यूं लेय`र आवो (देगचो बी हांडी रै डौळ बरगो हुवै, कांई हुयो जे बो माटी रो कोनी हुवै) ? इस्यो भांडो ल्यावो दखां जकै रै पींदो ऊपर अर मूंडो हेटै हुवै। का फेर हांडी सूं इतणी ई घिरणा है थांनै तो जेठ मांय पाणी स्टील रै बरतन मांय घाल्या करो। जद तो.. 'मां अे ! सुभानआळै घरां सूं कोरी माट लेय`र आयी अेक`।
हांडी माटी री ई हुया करै, काठ री नीं। हांडी बिनां सरै कोनी अर नीं सरै माटी बिनां। घर घर माटी रा चूल्हा अर माटी री ई हांडी। हांडी सूं दूर नां हुवो। माटी सूं दूर हुय जास्यो... अर हळवां हळवां इतियास सूं ई ! अर जे अचाणचक ई किण ई सेंटरियै मंंतरी रै चित्त चढगी तो ओजूं घर घर माटी री हांडी हुय जासी। पछै ले लेईयो दखां छिंटा ?

पूर्ण ार्मा 'पूरण`
प्रा० स्वा० के० रामगढ़
त० नोहर, जिला- हनुमानगढ़
९८२८७६३९५३